नवमधुकर वर्ष 1 अंक 1
श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद्, टीकमगढ (म.प्र.)
’’नव-मधुकर’’(ई-पत्रिका)
आपकारामगोपाल रैकवार
अध्यक्ष की कलम से
अध्यक्षश्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषदटीकमगढ़
(म.प्र.)
(2) हर हालत में लेख की एक प्रति अपने पास रख ली जाए।
(3) संशोधन के लिए काफ़ी जगह छोड़ दी जाए।
(4) यह बात न भूली जाए कि लेखों में यथोचित काट-छाँट करने का अधिकार संपादक को है। अनेक लेख तो हमें फिर से लिखने पड़ते हैं। अपने पाठकों के समय का हमें ध्यान रखना पड़ता है इसलिए जो महानुभाव अपनी यह जिद रखना चाहें कि उनके लेख ज्यों के त्यों छपें उनसे हम प्रारंभ में ही क्षमा प्रार्थना करे लेते हैं। ‘मधुकर’ उनके इस आदेश को मानने में सर्वदा असमर्थ है। वह बस इतनी गारंटी कर सकता है कि लेखकों के भावों की रक्षा होगी।
‘मधुकर’ के लिए उपयुक्त विषय-
बुन्देलखण्ड के/की ऐतिहासिक स्थान, प्राकृतिक स्थल, रीति-रिवाज, त्यौहार, स़्त्री-शिक्षा की समस्या, भूगोल, इतिहास, रजवाड़े, अर्वाचीन कवि, प्राचीन कवि, प्रचलित कविताएँ, ग्राम्य गीत, कहावतें, टहूका, शब्द-कोष, स्वास्थ्य संबंधी समस्या, पशु-पक्षी, ढोरों की नस्ल में सुधार, कृषि-समस्या।
इसके सिवा और भी उपयोगी विषय चुने जा सकते हैं। लेख लिखना कोई मुश्किल बात नहीं। थोड़े-से अभ्यास की ज़रूरत है। यदि आपको कोई खास चीज़ कहनी है तो बेखटके अपनी भाषा में उसे लिख भेजिए। हम ठीक करके छाप देंगे। ‘मधुकर’ नवीन लेखकों के निर्माण में अपना गौरव समझेगा।
-बनारसीदास चतुर्वेदी
श्रद्धांजलि
पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी
(जन्म 24 दिसंबर 1842 मृत्यु 2 मई 1985)
हिंदी के प्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार थे। वे राज्यसभा के सांसद भी थे। उनके संपादन में कोलकाता से विशाल भारत नामक हिंदी मासिक पत्रिका निकलती थी। वह अपने समय के अग्रगण्य संपादक थे तथा वे अपनी विशिष्ट और स्वतंत्र वृत्ती के लिए जाने जाते हैं। 1973 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। साहित्य और जीवन, रेखाचित्र, संस्मरण, सत्यनारायण कवीरत्न, भारत भक्त एंड्रयूज, केशवचंद्र सेन, प्रवासी भारतीय, फिजी में भारतीय, फिजी की समस्या, हमारे आराध्य और सेतुबंध आपकी प्रमुख रचनाए है। --प्रकाशक
बुन्देलखण्ड- इतिहास के पन्नों से-
वर्ष 1929 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक नये युग के सूत्रपात का सूचक है, जब स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता गांधीजी ने ’सत्याग्रह’ के रूप में पुनः गांडीव धारण किया। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का नारा दिया गया। अतः गांधीजी नें आंदोलन को गतिशील करने के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों का विस्तार किया, जिसका प्रभाव गांव-गांव तक फैला। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पूर्ण स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया गया और इसने लोगों में अभूतपूर्व देशभक्ति का संचार किया।
लाहौर अधिवेशन के सविनय अवज्ञा के संकल्प मे शामिल कर बंदी को अस्त्र बनाकर गांधी जी ने नमक का कानून तोड़ने के लिए पदयात्रा प्रारंभ की और सविनय अवज्ञा आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
देश के अन्य भागों की तरह बुंदेलखण्ड क्षेत्र में भी इस आंदोलन की गतिविधियां तेजी से बढीं। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी के उपयोग को बढ़ावा देने तथा कर न देने जैसे विषयों पर लोग बैठकें व सभाएं कर एकदूसरे को जागरूक कर रहे थे। ऐसी ही एक सभा 14 जनवरी 1931 को ’मकर संक्रांति’ के दिन छतरपुर के चरण-पादुका में आयोजित की गई थी, जिसमें हजारों लोग सम्मिलित थे, इस सभा को अंग्रेजी सेना ने घेर लिया था और अनगिनत गोलियां चलाईं, जिसमें कई लोग मारे गये एवं अनेक घायल हुए। इस घटना को ’बुंदेलखण्ड का जलियांवालबाग’ की संज्ञा दी गई। यह घटना बुंदेलखण्ड क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन की अविस्मरणीय घटना है।
भारत की आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर इस अमिट गाथा का स्मरण स्वतंत्रता आंदोलन में बुंदेलखण्ड के योगदान को नये सिरे से परिभाषित करता है। प्रस्तुत शोध पत्र चरण-पादुका की इस घटना के विस्तृत विश्लेषण और स्वतंत्रता आंदोलन में इसके महत्व पर प्रकाश डालने का एक प्रयास है।
मुख्य शब्दः बुंदेलखण्ड, चरण-पादुका, स्वतंत्रता आंदोलन, गांधीजी।
प्रस्तावनाः-भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास मे बुंदेलखण्ड में हुए स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देशभर में हुए विभिन्न आंदोलनों की प्रतिध्वनि बुंदेलखण्ड क्षेत्र में भी सुनाई देती रही और प्रतिक्रिया स्वरूप बुंदेलखण्ड
की जनता ने बढ़चढकर प्रत्येक आंदोलन में हिस्सा लिया, निःसंदेह इसके प्रेरणा स्रोत गांधीजी थे। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता महात्मा गांधी अपने युग के निर्माता और विश्व की मानव शक्ति की अहिंसात्मक स्फूर्ति का जीवित प्रतिमान हैं। उन्होने मानव जाति को अहिंसा और सत्य का जो संदेश दिया उसने बुंदेलखण्ड में भी स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु अहिंसात्मक आंदोलन करने के लिए जनमानस को प्रेरित किया।
वर्ष 1929 भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक नये युग के सूत्रपात का सूचक है, जब गांधीजी ने ’सत्याग्रह’ के रूप में पुनः गांडीव धारण किया। कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का नारा दिया गया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पूर्ण स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया गया और इसने लोगों में अभूतपूर्व देशभक्ति का संचार किया। गांधीजी नें आंदोलन को गतिशील करने के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों का विस्तार किया, जिसका प्रभाव गांव-गांव तक फैला। उन्होने लाहौर अधिवेशन के सविनय अवज्ञा के संकल्प मे शामिल कर बंदी को अस्त्र बनाकर नमक का कानून तोड़ने के लिए पदयात्रा प्रारंभ की और सविनय अवज्ञा आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
12 मार्च सन् 1930 को महात्मा गांधी ने अंग्रेज सरकार द्वारा नमक पर लगाये गये अमानवीय कर के खिलाफ 78 अनुयायियों के साथ साबापती से समुद्र के किनारे स्थित दांडी तक की 390 किमी की पैदल यात्रा की और 6 अप्रैल सन् 1930 को समुद्र किनारे नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने की घोषणा की। इस ऐतिहासिक यात्रा में उन्होने गांव-गांव में लोगों को संबोधित किया और उनसे विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी के प्रयोग तथा सरकार को कर न देने की अपील की।
मध्यप्रदेश के बुंदेलखण्ड क्षेत्र मे भी उनके इस आहवान का व्यापक असर हुआ और लोग इस आंदोलन में शामिल होकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तथा स्वदेशी के प्रयोग और कर न देने के लिए एकजुट होने लगे।
पृष्ठभूमिःसविनय अवज्ञा के इस आंदोलन के पहले तत्कालीन बुंदेलखण्ड क्षेत्र में जनता ने गांधीजी के असहयोग और खिलाफत आंदोलन के दौर में भी सक्रिय योगदान दिया था, और सन् 1920 में भाई अब्दुल गनी और पं. माखनलाल चर्तुवेदी के नेतृत्व में सागर और जबलपुर में रतौना आंदोलन चलाया गया था तथा 1923 महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सन् 1930 आते-आते तक गांधीजी के नमक सत्याग्रह के आह्नवान पर जनमानस में पुनः चेतना का संचार हुआ।जनता करों के बोझ, अंग्रेजों की दमनकारी नीति, और स्थानीय शासकों के उपेक्षित व्यवहार से आहत थी। भारतीय होते हुए भी ये शासक जनता से बेहिसाब कर वसूल रहे थे और जनता उनसे त्रस्त थी। उस समय पिछड़ी जातियों से हालू, हल की लकड़ी पर हरोका, पिता की मृत्यु पर चौथ, खेत पर बनाई गई झोपड़ी पर मंडवकाष्त, विधवा पुनर्विवाह पर बचलखा, तथा गुलयावन, नजराना, महूटा, स्थायी झिरी नामक कई प्रकार के कर जनता से अमानवीयता पूर्वक वसूले जाते थे। ऐसे में गांधीजी के कर न देने के आह्नवान ने लोगों को एकजुट होकर इन करों के विरोध में उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया।
इससे पूर्व 29 नवंबर सन् 1929 में गांधीजी की महोबा यात्रा ने भी जनमानस को उद्वैलित किया था और लोगों में देशभक्ति की भावनाएं हिलोरें ले रही थी। चरण-पादुका, छतरपुर जिले के महाराजपुर से 10 किलोमीटर दूर नौगांव विकासखण्ड की सिंहपुर ग्रामपंचायत में उर्मिल नदी के किनारे स्थित है। छतरपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को संचालित करने में पं. रामसहाय तिवारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही, खिलाफत आंदोलन के समय अली बंधुओं के महोबा आने के समय से ही वे गांधीवादी विचारधारा और आंदोलनों से जुड़ गये थे। जब सन् 1929 में गांधीजी महोबा आये थे तब वे गांधीजी से भी मिले थे। ब्रिटिश दमन के विरूद्ध एक बारगी को वे क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर उन्मुख हो गये थे, उस समय क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद काकोरी कांड के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए ओरछा रियासत में सतारा नदी के तट पर रहे थे तब उनसे मिलकर वे क्रांतिकारी गतिविधियों की योजना बना रहे थे। किंतु सेवाग्राम की यात्रा और गांधीजी से भेंट ने उन्हें पुनः अहिंसक आंदोलन के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
वस्तुतः ये सभी घटनाएं लोगों के मन में स्थानीय रियासतों के शासकों के प्रति पनप रहे असंतोष तथा ब्रिटिश शासन के खिलाफ आक्रोश को व्यक्त कर रही थीं और पं. रामसहाय तिवारी जैसे नेताओं के नेतृत्व में लोगोंमें व्याप्त जनचेतना को जाग्रत करने का कार्य कर रही थीं।
प्रमुख गतिविधियां, घटनाक्रम और चरण पादुका हत्याकांडः उस समय बुंदेलखण्ड छोटी-छोटी रियासतों के रूप में तत्कालीन संयुक्त प्रांत, आगरा व अवध की सीमाओं से जुड़ा हुआ था और स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां अपने चरम पर थीं। छतरपुर के मदरा, सिंजवाहा, ल्यौरैया, कैमहा, उरवारा तथा ननौरा आदि ग्रामों में पं.रामसहाय तिवारी के नेतृत्व में कर न देने का आंदोलन तेजी से फैला,फलस्वरूप उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी अनापस्थिति में रंगोली के ठाकुर हीरा सिंह और भुजबल सिंह ने आंदोलन की कमान संभाली। धीरे-धीरे यह आंदोलन राजनगर, चंदला, व लुगासी तक फैल गया। इसी तरह छतरपुर राज्य की सीमा से लगे हमीरपुर जिले के टहनगा निवासी अपने क्षेत्र में आजादी के लिए संधर्षरत थे। वे भी छतरपुर राज्य की जनता के उत्पीड़न से अनजान नहीं रहे थे और उन्होने भी अपना क्षेत्र छोड़कर छतरपुर में राजशाही के अत्याचारों से जनता को मुक्ति दिलाने का प्रण किया था।
इस आंदोलन की तीव्रता इसी से स्पष्ट होती है कि इस दौरान आंदोलनकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों ने कई सभाएं की थीं और इनमें आंदोलन के लिए लोगों को लामबंद करने और कर न देने के लिए रणनीतियां तैयार की जाती थीं। ऐसी ही एक सभा चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में 4 सितंबर 1929 को पाण्डव प्रपात में हुई जिसमें रामसहाय तिवारी, प्रेमनारायण खरे, नारायण खरे, बिहारीलाल विश्वकर्मा तथा जयनारायण आदि भी शामिल थे।
इसी प्रकार एक सभा भितरिया के जंगल में मियराने के पास हुई, जिसमें 15 से 20 व्यक्तियों की उपस्थिति में रांगोली के कुंवर हीरा सिंह को सभापति और पं. रामसहाय तिवारी को मंत्री चुना गया था। पंडित सुखदेव और कुं. जगतसिंह डहर्रा के नेतृत्व में राजनगर में आंदोलनरत जनता पर लाठीचार्ज किया गया। एक अन्य विशाल सभा महाराजपुर गांव में हुई, जिसमें मजिस्ट्रेट के आने से जनता उत्तेजित हो उठी और उसकी गाड़ी पर पथराव किया गया परिणामस्वरूप कई लोगों पर ज ुर्माना लगाया गया। राजनगर के निकट खजुआ गांव में लगान न देने के विरूद्ध गोलीचालन की घटना हुई। एक अन्य विशाल सभा जिसमें लगभग 80000 लोगों ने भाग लिया, अक्टूबर के अंत में बेनीगंज बांध के निकट हुई। इस सभा के अध्यक्ष कुँवर हीरासिंह थे। इस सभा में मुख्य वक्ता के रूप में पं. रामसहाय तिवारी ने लोगों को बताया कि किस प्रकार पुलिस ने उनकी जूतों से पिटाई की। भाषणों में सरकार द्वारा दमन और अत्याचार की क्रूरतापूर्ण कार्यवाहियों के बारे में सुनकर आंदोलनकारियों में उत्तेजना बढ़ना स्वाभाविक था और विरोध के उनके स्वर और प्रबल हो उठे।
एक अन्य घटनाक्रम में छतरपुर रियासत की ही लौंडी तहसील मे ंकर न देने के कारण गनेशा हरिजन को इतना पीटा गया कि उसकी मृत्यु हो गई। इसके परिणामस्वरूप आंदोलन और तेज हो गया और पास की बिजावर रियासत समेत बुंदेलखण्ड की समस्त रियासतों तक फैल गया। जनआंदोलन को मिल रहे व्यापक
समर्थन से राजा व नौकरशाह चिंतित हो उठे और तत्कालीन छतरपुर नरेश विश्वनाथ सिंह ने आंदोलन को दबाने के लिए नौगांव के पालिटिकल एंजेंट फिशर से सहायता मांगी।
30 अक्टूबर 1930 को दशहरे के दिन चरण पादुका में ही कुंवर हीरासिंह की अध्यक्षता में सभा हुई जिसमें एक लाख से अधिक लोग सम्मिलित हुए। इतनी अधिक संख्या में लोगों की उपस्थिति से सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आंदोलन का प्रवाह कितना तेज था और लोग किस तरह से कर न देने के लिए सरकार के खिलाफ रण में उतर पड़े थे। इसी सभा में पॉलिटिकल एजेंट फिशर ने पं. रामसहाय तिवारी को संदेश दिया कि वह जनता की समस्याओं का समाधान करना चाहता है और जनप्रतिनिधियों से मिलना चाहता है उसने धुर बेहर नामक स्थान पर लोगों को बताया कि 4 जनवरी 1931 को गवर्नर जनरल के इंदौर स्थित एजेंट नौगांव आयेंगे तो वे उनसे मिलकर अपनी बात रख सकते हैं।
आंदोलनकारियों का सोचना था कि बजाय अंग्रेजों को महत्व देने के छतरपुर महाराजा से मिलकर अपनी समस्याओं का हल निकालना ज्यादा अच्छा है, इसके लिए पं. रामसहाय तिवारी ने तहसीलदार श्याम सुंदर भट्ट और दीवान सुखदेव बिहारी के साथ मिलकर छतरपुर महाराजा से मिलने का समय तय किया किंतु यह मुलाकात नही हो सकी क्योंकि पॉलिटिकल एजेंट फिशर को इस प्रकार महाराजा से मिलने पर अपना महत्व कम होता नजर आया और उसने दुर्भावनापूर्वक कार्यवाही कर दीवान सुखदेव बिहारी को छतरपुर छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया और तहसीलदार श्याम सुंदर को निलंबित कर दिया।
अंतिम विकल्प के तौर पर आंदोलनकारियों ने 4 जनवरी 1931 को 2 हजार लोगों के साथ नौगांव में एजीजी इंदौर से भेंट की जिसने कर अदा करने में किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दऔर कर संबंधी शिकायतों के परीक्षण के लिए एक अंग्रेज अधिकारी की नियुक्ति भर कर दी जिसकी रिपोर्ट के आधार पर लगान में सुधार की बात कही। अंग्रेज अधिकारी के रूखे व्यवहार से आंदोलनकारी असंतुष्ट हो गये और उनका आक्रोश भड़क उठा। पॉलिटिकल एजेंट फिशर ने भी इस मौके पर सभी आसपास की रियासतों में आंदोलनकारियों की किसी भी अप्रत्याशित कार्यवाही का मुकाबला करने के लिए मालवा से कौल और भील फौज मंगवाकर सभी जगह तैनात कर दी और 6 से 12 जनवरी तक आंदोलन वाले क्षेत्रों का दौरा कार्यक्रम रखा।
फिशर के व्यवहार से उत्तेजित होकर पं. रामसहाय तिवार ने फिशर को मारने का प्रयत्न किया, जब वह टीकुर ग्राम में था, किंतु संख्त पहरे के कारण वपकड़ लिये गये और उन पर मुकदमा चलाकर उन्हे 9 वर्श कठोर कारावास की सजा दी गई। चरण-पादुका हत्याकाण्डः रामसहाय तिवारी की गिरफ्तारी ने आग में घी का काम किया और जनता के असंतोश को और बढ़ा दिया। उनकी रिहाई के लिए जनता ने 14 फरवरी मकर संक्रांति के दिन चरण-पादुका में एक बड़ा प्रदर्शन करने का निर्णय लिया, क्योंकि उस दिन वहां मेला भरता था और अधिक से अधिक लोगों के आने की संभावना थी।
चरण-पादुका, के नामकरण के पीछे ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीराम वनवास काल में यहां रूके थे और उनके चरण चिन्ह एक प्रस्तर खण्ड पर अंकित होने के कारण इसे चरण-पादुका नाम दिया गया। चरण-पादुका की इस सभा की अध्यक्षता सरजू दउआ कर रहे थे और पं. रामसहाय तिवारी की अनुपस्थिति में लल्लूराम मंत्री बनाए गये थे।
14 जनवरी 1931 को प्रातः 9 बजे आंदोलनकारी सभा स्थल पर एकत्र होने लगे, लगभग एक लाख लोग इसमें सम्मिलित थे। सभा की कार्यवाही प्रारंभ हुई और जिस समय लल्लूराम का इस विशाल सभा में भाषण हो रहा था, फिशर एक दर्जन से अधिक वाहनों पर सेना लेकर सभा स्थल पर आ गया और मेले में हो रही सभा को सेना ने घेर लिया तथा मंच व स्थल खाली करने को कहा। आंदोलनकारियों ने मांगे मन जाने पर ही मंच खाली करने की बात कही। फिशर ने फौज से घिरे सभा स्थल में निहत्थी जनता पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस हत्याकाण्ड में 21 लोगों की मृत्यु हुई और 26 व्यक्ति घायल हुए, जबकि मरने वालों की संख्या वास्तव में काफी अधिक थी। इसमें सैकड़ों क्रांतिकारी, सेनानी शहीद हो गए थे और हजारों लोग घायल हुए थे। उर्मिल नदी का पानी लहू बहने के कारण लाल हो गया था।
अतः इस घटना को ’बुंदेलखंड का जालियावाला हत्याकाण्ड’ का नाम दिया गया। अंग्रेज सरकार ने इस कांड पर पर्दा डालने के लिए सिर्फ 6 शहीद ही बताए थे और शेष नदी में दफन कर दिए थे। मरने वाले 6 शहीदों में सुंदरलाल वैश्य, छीरू कुर्मी, रामलाल कुर्मी, हलकई अहीर, धरमराठ और रामलाल शामिल थे।
इस हत्याकाण्ड के बाद अंग्रेज फौज द्वारा भीषण लूटपाट की गई और कई मकानों को तोड़ा और जला डाला गया जिनमें लल्लूराम का मकान भी था। सत्याग्रह आंदोलन को दबाने के लिए 21 लोग गिरफ्तार किए गए, उनमें से सरजू दउआ को चार वर्ष व बाकी 20 लोगों को तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारवास की सजा सुनाई गई। इस हत्याकाण्ड के बाद इस घटना की जांच के लिए 15 जनवरी
ं1931 को एक पीस काउंसिल की नौगांव में बैठक हुई जिसमे देशी रियासतों के राजा शामिल थे, जैसा कि अंदेशा था उन्होने अंग्रेज सरकार के प्रभाव में आकर फिशर का ही बचाव किया था।
निष्कर्षः ’चरण-पादुका हत्याकाण्ड’ ने जनचेतना और देशभक्ति की भावना में अभूतपूर्व वृद्वि की, तात्कालिक रूप से तो आंदोलन को रोकने में सफलता मिल गई लेकिन इससे पैदा हुई राष्ट्र चेतना ने आने वाले वर्षो में बुंदेलखण्ड में स्वतंत्रता आंदोलन को लगातार प्रेरणा प्रदान की। लोगों का लगातार सभाएं करना और अनवरत संघर्ष इस आंदोलन की गहराई को दर्शाता है। स्थानीय रियासतों विशेषकर छतरपुर रियासत के शासक अंग्रेजों के प्रभाव में आकर जनता पर अमानवीय तरीके से शासन कर रहे थे और जनता को संतुष्ट करने में असफल रहे। बुंदेलखण्ड की अन्य सभी रियासतें भी जनता के विश्वास पर खरी नहीं उतर पाईं, क्योंकि जब चरण-पादुका की घटना की जांच की बारी आई तो वे भी अंग्रेजों के प्रभाववश निष्पक्ष निर्णय नही कर पाये।
ऐसे में कहा जा सकता है कि यह आंदोलन इन रियासतों के शासकों की नीतियों और अंग्रेज सरकार के विरूद्ध एक स्वतः स्फूर्त आंदोलन की तरह संचालित हुआ। गांधीजी के आहवान पर करबंदी के इस आंदोलन की एक खास बात यह भी थी कि चूंकि बुंदेलखण्ड क्षेत्र के आसपास समुद्र नहीं था अतः नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन नही किया जा सकता था तो जनता ने अपने स्थानीय नेताओं के नेतृत्व के सहारे कर न देने के लिए आंदोलन को व्यापक रूप से अपनाया और उसमें सहभागिता की।
निश्चित तौर पर वे करों के बोझ से दबे थे अतः गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन ने उनके लिए संजीवनी का कार्य किया। इस पूरे आंदोलन में पं. रामसहाय तिवारी का महत्वपूर्ण योगदान रहा और उन्होने पूरी लगन से जनता को आंदोलन से जोड़ने और तानाशाही सरकार के अत्याचारों से जनता को मुक्त कराने के प्रयास किये। आगे भी भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिकाएं रहीं और आजादी प्राप्त होने तक वे स्वतंत्रता आंदोलन से सतत् जुड़े रहे।
महत्वः- यह घटना बुंदेलखण्ड के स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में जनता के सक्रिय प्रतिरोध को दर्शाती है। गांधीजी के अहिंसा और सत्य के संदेश को स्वतंत्रता सेनानियों ने हृदय से अपनाया और आंदोलन को सफलता की ओर पहुंचाने की कोशिश की। पं. रामसहाय तिवारी ने गांधीवादी तरीकों से सत्याग्रह की मशाल को अंत तक प्रज्वलित किये रखा। इस हत्याकाण्ड की करूण गाथा को कवियों और लेखकों ने अपनी कलम से वर्णित भी किया।
श्री भागीरथ शर्मा ने ’चली फिरंगी गनमशीन’ जब शीर्षक अपनी कविता में इस घटना का यथार्थ चित्रण किया। उनका यह लोकगीत जैसे बुंदेलखण्ड की आजादी का गीत बन गया। इसी प्रकार बुंदेलखण्ड के एक अन्य जनकवि श्री गोकुल प्रसाद ने 14 जनवरी 1932 को ’छतरपुर की जन-क्रांति’ शीर्षक के साथ एक कविता लिखी जो चरण-पादुका हत्याकाण्ड का प्रामाणिक विवरण देती है।
चरण-पादुका के बलिदान स्थल पर स्वतंत्रता आंदोलन के इन अमर बलिदानियों के सम्मान में तथा उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए तत्कालीन केंद्रीय रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम ने 8 अप्रैल 1978 को शहीद स्मारक का शिलान्यास किया था और इस शहीद स्मारक का अनावरण मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह द्वारा 14 जनवरी 1984 को किया गया था। इस स्मारक पर अमर बलिदानी देशभक्तों अमर शहीद सेठ सुंदर लाल गुप्ता गिलौंहा, ध्रदास मातों खिरवा, रामलाल गोमा, चिंतामणि पिपट, रघुराज सिंह कटिया, करण सिंह, हलकाई अहीर, हल्के कुर्मी, रामकुंवर, गणेशा चमार, लौंड़ी आदि के नाम अंकित हैं। ’बुंदेलखंड के इस जालियावाला बाग’ चरण-पादुका के शहीद स्मारक पर 14 जनवरी के दिन प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। इस वीरगाथा और अमर स्मारक का महत्व इससे भी स्पश्ट है कि देश की स्वतंत्रता के 75 वें वर्ष पर आयोजित हो रहे अमृत महोत्सव के कार्यक्रमों की मध्यप्रदेश में शुरूआत चरण-पादुका से ही की गई है।
-डां. ए पी श्रीवास्तव
संदर्भः
1. बुंदेली बसंत, सं. डॉ. बहादुर परमार, अंक 8,वर्ष 8 18 फरवरी 2007, बुंदेली विकास संस्थान, बसारी जिला छतरपुर, पृ. 1-3
2. श्रीवास्तव बी. के, बुंदेलखण्ड का स्वतंत्रता संघर्श, डी के प्रिंट वर्ल्ड नई दिल्ली, 2020 पृ.196
3. सक्सैना सुधीर, ऐसे आए गांधी, स्वराज पुस्तकमाला, स्वराज भवन, पृ.10
4. भदौरिया, संतोश, बुंदेलखण्ड का स्वाधीनता आंदोलन और पत्र-पत्रिकाएं, स्वराज पुस्तकमाला 2008 पृ. 141-147
5.विंध्य वाणी साप्ताहिक, टीकमगढ ़, सं. प्रेमनारायण खरे, वर्श1, अंक 1 गांधी जयंती,1948, पृ. 14-17
6. टीकमगढ़ दर्शन, सं. महेन्द्र द्विवेदी, प्रकाशक शांतिचंद्र द्विवेदी,
7. त्रिपाठी, डॉ. के. पी, बुंदेलखण्ड का वृहद इतिहास, प्रकाशक पं. ललित नारायण त्रिपाठी, भारत भवन टीकमगढ ़
श्री वीरसिहदेव पुरस्कार
सन 1935 का वर्ष हिंदी साहित्य संसार के इतिहास में अविस्मरणीय एवं अमर रहेगा जब ओरछेश श्री वीर सिंह जूदेव ने तत्कालीन हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ पुरस्कारों की निर्धारित मुद्रा सीमाओं से सर्वाधिक वीरसिंह जूदेव पुरस्कार की घोषणा श्री वीरेंद्र केशव साहित्य परिषद के तत्वाधान में उसके वार्षिक अधिवेशन के अवसर पर की थी।
श्री कपिल देव तेलंगः-
मेरा जन्म टीकमगढ़ में ही हुआ किंतु मेरे जन्म की प्रथम घोषणा बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में की गई थी। इस घोषणा के समय हिंदी के दिग्गज विद्वान उपस्थित थे। मेरा पूरा नाम तो वीरसिंहदेव पुरस्कार था किंतु संक्षेप में मैं देव पुरस्कार नाम से अभिहित एवं प्रसिद्ध हुआ। यह मेरे सर्जन हार की संकोचशीलता और निरभिमानता का घोतक है। हिंदी के अनन्य प्रेमी महाराजा वीरसिंहदेव ;ओरछा नरेश मेरे सर्जक थे हिंदी के सर्वस्य एवं युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अभिनंदन का विशाल समारोह था अभिनंदन पत्र समर्पण महाराजा भी वीरसिंहजूदेव ने किया था तभी मेरे अस्तित्व की घोषणा की गई इस घोषणा के साथ ही मेरी जन्मस्थली टीकमगढ़ और सर्जक महाराजा का नाम हिंदी जगत में सर्वाधिक प्रशंसित और प्रसिद्ध हुआ था अब तो कदाचित देव का अर्थ महाराजा वीर सिंहदेव से न लेकर महाकवि देव से लगने लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं
मेरी निधि दो सहस्त्र रौप्यमुद्राएं वार्षिक थी उस समय का मै सर्वाेच्च प्रभुतावान पुरस्कार था यह सर्वाेच्चता बहुत समय तक अक्षुण्ण रही यद्यपि मेरे कुछ अग्रज भी थे जो वय में अधिक थे पुराने थे किंतु मोल-तोल में मुझ से अल्प ही थे सेकसरिया पुरस्कार और मंगलाप्रसाद पारितोषिक। वीरेंद्र केशव साहित्य परिषद मेरा संचालन करती मार्गदर्शन करती थी मेरा रंग ढंग ही निराला था
प्रथम वर्ष मेरा समर्पण दुलारे दोहावली पर श्री दुलारे लाल भार्गव को हुआ मुझे पूरे समयक्रम से अब नाम विस्मृत हो गए हैं पर चित्ररेखाकार डॉक्टर राजकुमार वर्मा हल्दीघाटी के लेखक श्री श्याम नारायण पांडे डॉक्टर गोपाल शरण सिंह श्री यशपाल आदि की सन्निधि की स्मृतियों अब भी शेष हैं। मेरे ही कोश से हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के माध्यम से हिंदी के अनेक सदग्रंथों का प्रकाशन हुआ जिसमें हिंदी की वृहतत्रयी के सर्वश्री निराला, पंत एवं श्रीमती महादेवी वर्मा के संकलन ‘आधुनिक कवि’ नामक पुस्तक माला के रूप मे प्रकाशित हुए।
प्रसिद्ध साहित्यकार श्री राय कृष्णदास के ग्रंथों का प्रकाशन भी मेरे द्वारा संपन्न हुआ। कुछ वर्षों की विश्रांति पश्चात विंध्य प्रदेश निर्माण के साथ ही मेरा नवीनीकरण हुआ मेरे यात्रा में वृद्धि हुई विंध्य प्रदेश की राजधानी रीवा आवास स्थल बना और अब तो आपको मालूम ही होगा आज कल में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में डटा हुआ हूं
श्री पूर्णचंद्र रथः-
वर्ष 1956 में नए मध्यप्रदेश के गठन के बाद जब मध्यप्रदेश में विंध्य का क्षेत्र शामिल किया गया तो तदनुरूप प्रदेश की राज्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद का कार्य क्षेत्र भी विस्तृत हुआ। फलतः विंध्य प्रदेश हिंदी पुरस्कार समिति द्वारा दिए जाने वाले 13 पुरस्कार नवीन मध्यप्रदेश की साहित्यिक इकाई शासन साहित्य परिषद द्वारा घोषित किए जाने वाले पुरस्कार विषयों के साथ जोड़ दिए गए इस प्रकार वर्ष 1952 -53 से विंध्य प्रदेश हिंदी पुरस्कार समिति द्वारा बुंदेलखंड के लोकप्रिय महाराजा वीर सिंह देव के नाम से प्रतिवर्ष दिए जाने वाला यह पुरस्कार परिषद की शोभा बना। शासन साहित्य परिषद द्वारा यह पुरस्कार शामिल कर लिए जाने के पीछे साहित्य में महाराजा वीरसिंह देव की प्रतिष्ठा थी जो निसंदेह परिषद द्वारा विंध्य क्षेत्र की जन भावनाओं का आदर और सम्मान ही प्रदर्शित करती है। मध्यप्रदेश शासन साहित्य परिषद द्वारा इस महत्वपूर्ण और सम्माननीय पुरस्कार विषय के लिए पहली बार वर्ष 1959-60 में पुस्तकें आमंत्रित की गई थी तब से अब तक भले ही परिषद इस पुरस्कार के लिए विषयों में परिवर्तन करती रही लेकिन अपनी पुरस्कार योजना में देव पुरस्कार की प्रथा और महत्ता को बराबर बनाए रही। वर्ष 1960 से अब तक मध्य प्रदेश शासन साहित्य परिषद द्वारा प्रारंभ इस महत्वपूर्ण पुरस्कार को प्राप्त करने का सम्मान जिन विद्वान लेखकों को प्राप्त हुआ उनका विवरण इस प्रकार हैः-
देव पुरस्कार से पुरस्कृत साहित्यकारों की सूचीः सन् 1935 से सन 2021
क्र. वर्ष साहित्यकार पुरष्कृत पुस्तक का नाम
1. सन् 1935 श्री दुलारेलाल भार्गव दुलारे दोहावली
2. सन् 1936 श्री रामकुमार वर्मा चित्रलेखा
3. सन् 1937 श्री रामनाथ जोतिसी श्री राम चंद्रोदय
4. सन् 1938 निरंक (पुंरस्कार राशि काशी नागरी प्रचारिणी सभा
व हिन्दी साहित्य सम्मेलन को साहित्य प्रकाशन हेतु दी गई)
5. सन् 1939 किसी ग्रंथ का चयन नहीं।
6. सन् 1940 पं श्यामनारायण पाण्डेय हल्दीघाटी
7. सन् 1941-ंउचय42 श्री हरदयालु सिंह ‘हरिनाथ’ दैत्यवंश
8. सन् 1942-ंउचय43 श्री माखनलाल चतुर्वेदी हिमकिरीटनी
9. सन् 1943-ंउचय44 श्री अनूप शर्मा फेर मिलबो
10. सन् 1944-ंउचय45 लोकनाथ सिलकारी को साहित्य प्रकाशन हेतु दी गई)
11. सन् 1945-ंउचय46 जानकारी अप्राप्त
12. सन् 1945-ंउचय47 जानकारी अप्राप्त
13. सन् 1947 से 1952 पुरस्कार प्रदान नहीं किया गया। तत्पश्चात विन्ध्य प्रदेश
द्वारा
14. सन् 1953 श्री चंद्रवली पाण्डे केशवदास (आलोचना)
15. सन् 1954 श्री ठाकुर गोपाल शरण सिंह
16. सन् 1955 श्री उदयनारायण तिवारी
17. सन् 1956 श्री पर-रु39याुराम चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश -रु39याासन द्वारा
18. सन् 1959-ंउचय60 श्री आनंदमिश्र( सन् 1956 में चयनित) हिमालय
के आँसू
19. सन् 1961 श्री राजनाथ पाण्डे सुबहे बनारस
20. सन् 1962 श्री रमाशंकर तिवारी महाकवि कालिदास
21. सन् 1963 श्री आनंद मिश्र आँगन में रंगाोली बार-ंउचयबार
22. सन् 1964 एवं सन् 1965 में पुरस्कार प्रदान नहीीं किया गया।
23. सन् 1966 डॉ. इकबाल बहादुर शाहे अवध
24. सन् 1967 से सन् 1971 तक पुरस्कार प्रदान नही किया गया।
25. सन् 1972 श्री अमृतलाल नागर मानस के हंस
26. सन् 1973-ंउचय74 श्री राजेन्द्र अवस्थी बीमार शहर
26. सन् 1975 सुश्री मृदुला गर्ग उनके हिस्से की धूप
27 सन् 1976 श्री श्रीलाल शुक्ल मकान
28. सन् 1977 श्रीमती मेहरुन्निशा परवेज कोरजा
29. सन् 1978 श्री रामचंद्र शाह गोबर गणेश
30. सन् 1979-ंउचय80 श्री विनोद कुमार शुक्ल नौकर की कमीज
31. सन् 1981-ंउचय82
32. सन् 1982-ंउचय83 श्री योगेश कुमार सूखा स्वर्ग
33. सन् 1983-ंउचय84 श्री गिरिराज किशोर परिशिष्ट
34. सन् 1984-ंउचय85 श्री अमृतलाल नागर करवट
35. सन् 1986-ंउचय88 श्री प्रभु जोशी लंबी कहानियाँ
36. सन् 1989-ंउचय91 श्री वीरेन्द्र जैन डूब
37. सन् 1991-ंउचय92 से सन् 1992-ंउचय93 तक पुरस्कार प्रदान नहीं किया
गया।
38. सन् 1994 सुश्री मैत्रेयी पुश्पा इदन्न मम
39. सन् 1995 श्री मंजूर एहतेराम दास्तान-ंउचयए-ंउचयलापता
40. सन् 1996 श्री अब्दुल बिस्मिल्लाह मुखड़ा क्यों देखे
41. सन् 1997 श्री विद्यासागर नौटियाल सूरज सबका है
42. सन् 1998-ंउचय2000 सुश्री चित्रा मुद्गल आवाँ
43. सन् 2001-ंउचय02 श्री जितेन्द्र भाटिया जुस्त्जू-ंउचयए-ंउचयनिहा
44. सन् 2003-ंउचय05 श्री मिथिलेश्वर सुरंग में सुबह
45. सन् 2005-ंउचय06 डॉ. नीरजा माधव गेषे जम्पा
46. सन् 2006-ंउचय07 डॉ. महुआ माजी मैं बोरिशाइल्ला
47. सन् 2007-ंउचय08 प्रो. उशा यादव काहे री नलिनी
48. सन् 2008-ंउचय09 श्री विजय बहादुर मुक्तिोध
49. सन् 2009-ंउचय10 डॉ. मीनाक्षी स्वामी नतोअहम्
50. सन् 2010-ंउचय11 श्री अशोक जमनानी खम्मा
51. सन् 2011-ंउचय12 श्रीमती स्नेह ठाकुर कैकई चेतना शिखा
52. सन् 2012-ंउचय13 डॉ. सुधाकर अदीब शमे तारीख
53. सन् 2013-ंउचय14 श्री हरि भटनागर एक थी मैना, एक था कुम्हार
54. सन् 2014-ंउचय15 श्री हरि जोशी घुसपैठिया
55. सन् 2015-ंउचय16 श्री गुणसागर शर्मा ‘सत्यार्थी’ एक थी राय प्रवीण
56. सन् 2016-ंउचय17 श्री जगदीश तोमर नीलकण्ठ का स्वप्न
57. सन् 2017-ंउचय18 श्रीमती कृश्णा अग्निहोत्री हरिप्रिया
58. सन् 2018-ंउचय19 प्रो. मनीशा षर्मा ये इष्क.....
59. सन् 2019-ंउचय20 श्री आशुतोष राणा राम राज्य
60. सन् 2020-ंउचय21 श्री बलवीरसिंह ‘करुण’ डींग का जौहर
बुन्देलखण्ड में पलायन की समस्याः परिणाम और रोकने के सामाजिक उपाय
-रामगोपाल रैकवार
कहावतें लोक जीवन का दर्पण होती हैं। ये किसी भी अंचल की संस्कृति, समाज यहाँ तक कि अर्थ व्यवस्था का परिचय देने में समर्थ होती हैं। एक ऐसी ही लोक प्रसिद्ध बुन्देली कहावत है ‘खाँईं गकरियाँ, गाए गीत, अब जे चले चौतुआ मीत।’ ‘चौतुआ’ बुन्देलखण्ड के उन हजारों-लाखों व्यक्तियों को दी गई एक ऐसी संज्ञा है जो अपनी आजीविका या भरण-पोषण के लिए चौत्र माह में रबी की फसल काटने मालवा या हबेली (गंगा-यमुना का दोआब) क्षेत्रों में दशकों से जाते रहे हैं।
इनमें से अधिकतर गाँवों के खेतीहर मजदूर और सीमांत या लघु कृषक ही नहीं, कस्बों और शहरों के निर्धन परिवार भी हुआ करते थे। ये पलायन मौसमी हुआ करता था। हारवेस्टर आदि कटाई-गहाई यंत्रों के बढ़ते प्रयोग ने ‘चैतुआ’ प्रथा को लगभग समाप्त कर दिया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बुन्देलखण्ड में पलायन रुक गया है या कम हुआ है वास्तविकता तो यह है कि यह समस्या और अधिक विकराल हो गई है। पलायन का स्वरूप जो पहले कृषि मजदूरी के क्षेत्र में था अब निर्माण मजदूरी (कारखानों, भवन, सड़क, ईंट निर्माण आदि) के क्षेत्र परिवर्तित हो गया है। कुछ लोग स्वयं का रोजगार भी करने लगे हैं। बुन्देलखण्ड के कई युवाओं को जयपुर, जलंधर, लुधियाना ही नहीं सुदूर दक्षिण में चौन्नई आदि नगरों में भी पानी-पूरी बेचते देखा गया है।
पलायन की भयावह स्थिति-
पलायन बुन्देलखण्ड की नई समस्या नहीं है पर गत कई वर्षों के सूखे ने इसे भयावह स्थिति में ला दिया है। शासन द्वारा यथासंभव राहत प्रदान करने के उपरांत भी पलायन को न तो रोका जा सका है न ही कम किया जा सका है। कृषि भूमि पर कितना दबाव है यह राहत राशि के पारिवारिक बँटवारे में मिले भाग की अत्यल्पता को देखकर ही समझा जा सकता है। किसान, संवाददाता बुन्देलखण्ड. इन बाँदा और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर के एक लेख के अनुसार प्रवास सोसाइटी ने दो वर्ष पूर्व केन्द्रीय मंत्रीमंडल की आंतरिक समिति की रिपोर्ट के आधार पर जो आँकड़े प्रस्तुत किए थे उनके अनुसार उत्तरप्रदेश के बुन्देलखण्ड वाले हिस्से के बाँदा जिले से 7 लाख 37 हजार 920, चित्रकूट से 3 लाख 44 हजार 801, महोबा से 2 लाख 97 हजार 547, हमीरपुर से 4 लाख 17 हजार 489, उरई (जालौन) से 5 लाख 38 हजार 147, झाँसी से 5 लाख 58 हजार 377, ललितपुर से 3 लाख 81 हजार 316 मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्डवाले हिस्से के टीकमगढ़ जिले से 5 लाख 89 हजार 371, छतरपुर से 7 लाख 66 हजार 809, सागर से 8 लाख 49 हजार 148, पन्ना से 2 लाख 56 हजार 270, दतिया से 2 लाख 70 हजार 477 किसानांे और मजदूरों ने काम के लिए पलायन किया था।
पलायन क्यों ? पृष्ठभूमि-
बुन्देलखण्ड की अधिकांश भौगोलिक संरचना पठारी है। यहाँ की मिट्टी में ह्यूमस की कमी है। मार या काबर नामक जैसी उपजाऊ काली मिट्टियों का क्षेत्रफल अधिक नहीं है। इनकी गहराई भी कम है। पड़ुवा और राकड़ मिट्टी का प्रतिशत अधिक है जो कम उपजाऊ हैं।
पुराने चंदेलकालीन तालाबों और स्वतंत्रता के बाद बने कुछ बाँधों को अपवाद मानते हुए कहा जा सकता है कि बुन्देलखण्ड में सिंचाई के साधनों की सदैव कमी रही है। स्वतंत्रतापूर्व तो यह क्षेत्र वर्षा आधारित मोटे अनाज की उपज के लिए ही प्रसिद्ध था।
बुन्देलखण्ड की लगभग 80 प्रतिषत जनसंख्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। सामंती या जमींदारी प्रथा के कारण अच्छी और उपजाऊ भूमि के बड़े-बड़े भूखण्ड इन्हीं वर्गों के पास रहे हैं। आज भी सिंचाई के साधनों पर भी दबंगों का ही प्रभुत्व देखने को मिलता है। अधिकांश किसान लघु कृषकों की श्रेणी में ही आते हैं। ये किसान खेती के लिए या तो वर्षा पर या कुओं पर निर्भर हैं। निरन्तर गिरते भू-जल स्तर के कारण कुँओं से पूरे साल भर पानी मिलना अब बीते समय की बात हो गई है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड बताता है कि बुंदेलखंड क्षेत्र के जिलों के कुओं में पानी का स्तर नीचे जा रहा है और भूजल हर साल 2 से 4 मीटर के हिसाब से गिर रहा है। वहीं दूसरी ओर हर साल बारिश में गिरने वाले 70 हजार मिलियन क्यूबिक मीटर पानी में से मात्र 15 हजार मिलियन क्यूबिक मीटर पानी ही जमीन के अंदर में उतर पाता है।ग्रामीण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा खेतीहर मजदूरों का है। आज भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र में साल में प्रायः एक फसल ही हो पाती है। इससे प्राप्त उपज और मजदूरी इतनी नहीं होती कि किसान और खेत-मजदूर के परिवार को साल भर भरण-पोषण के लिए पर्याप्त हो। इसका अर्थ है साल के दो-तिहाई हिस्से मेकुछ दूसरे काम की तलाश जो मनरेगा जैसी योजनाओं के बावजूद गाँव में पूरी होना संभव नहीं हो पाती।
वर्तमान में अच्छी उपज के लिए उन्नत बीज, कीटनाशक, अधिक पानी और खाद के रूप में अधिक लागत की आवश्यकता पड़ती है। प्राकृतिक आपदा या अन्य किसी कारण से फसल बरबाद होने या सही मूल्य न मिलने पर अधिक लागत किसान को कर्ज के जाल में फँसा देती है।
कृषि योग्य भूमि में वृद्धि की अपेक्षा उस पर निर्भर जनसंख्या में हुई उत्तरोत्तर वृद्धि के फलस्वरूप कृषि पर दबाव निरंतर बढ़ा है। प्रत्येक पीढ़ी के बाद परिवार में हुआ बँटवारा कृषि जोतों को छोटा करता जाता है। छोटी जोत खेती की लागत में वृद्धि तो करती ही है लाभ भी कम देती है। यह दोहरी हानि खेती को अलाभदायक धंधे में बदल देती है। ऊपर से बे मौसम वर्षा, ओला वृष्टि, सूखा या अति वर्षा की मार किसान की कमर ही तोड़ देती है। खेत छोटे होने से मजदूरों की माँग कम हो जाती है क्योंकि आवश्यक श्रम की पूर्ति परिवार द्वारा ही हो जाती है। बेरोजगार खेत-मजदूर के पास पलायन के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचता।
कृषि पर आत्मनिर्भरता कम होने से किसान और खेतीहर मजदूर के साथ-साथ खेती या किसानों पर परोक्ष रूप से निर्भर अन्य परम्परागत व्यवसाय से जुड़े परिवार जैसे लुहार, बढ़ई, कुम्हार, नाई, कहार, वंशकार आदि भी प्रभावित हुए हैं और आजीविका के दूसरे साधनों की तलाश में पलायन को मजबूर हो गए हैं।
सैद्धांतिक रूप से यह माना जाता है कि पलायन के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक ही हैं लेकिन यहाँ यह भी समझ लेना आवश्यक है कि यह एकमात्र कारण भी नहीं है।
बुन्देलखण्ड में सामाजिक संरचना भी पलायन का एक बड़ा कारक है। ग्रामीण क्षेत्रों में दलित वर्ग के साथ समानता और सम्मानजनक व्यवहार तो दूर अमानवीय दुर्व्यवहार के निन्दनीय उदाहरण आज भी देखे जा सकते है। आज का युवा दलित ‘सम्मान रक्षा’ के भाव से प्रेरित होकर भी गाँवों से पलायन कर रहे हैं।
सामाजिक समरसता की बात तो छोड़िए पारिवारिक समरसता की ही यह स्थिति है कि खेत की कूँड़ भर मेड़ के लिए भी सगे भाइयों में आए दिन सिर-फुटौब्बल और मुकद्दमेबाजी सामान्य बात है। एक भाई के खेत की फसल को ढोरों द्वारा चरते हुए देखकर भी दूसरा भाई मूक दर्शक बना रहता है।
बुन्देलखण्ड में औद्योगिक विकास बहुत कम है। लघु और कुटीर उद्योग भी बड़े उद्योगों में बने सस्ते माल की प्रतिस्पर्धा न कर सकने के कारण पनप नहीे पाते हैं।
पलायन की इस विस्तृत पृष्ठभूमि के आधार पर बुन्देलखण्ड में पलायन के निम्नलिखित कारण उभर कर सामने आते हैं
1. प्राकृतिक आपदाएँ
2. संयुक्त परिवार प्रथा और उसका विखंडन
3. कृषि भूमि पर जनसंख्या का दबाव
4. कुटीर उद्योगों का अंत
5. ऋणग्रस्तता
6. पारिवारिक झगड़े और मनमुटाव
7. संचार और यातायात के साधनों का विकास
8. भूमिहीन श्रमिकों में वृद्धि
9. सामाजिक असमानता का व्यवहार
10. ऊँची मजदूरी का आकर्षण
11. शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन के साधनों का विकास
12. भूमि सुधारों की असफलता
पलायनः अध्ययन एवं षोध-
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट ‘श्रमिक भूमि क्यों त्याग रहे हैं कृषि से श्रमिकों के बाहर निकलने का तुलनात्मक अध्ययन’ (वर्ष 1966) में कहा गया है कि श्रमिकों द्वारा कृषि क्षेत्र से बाहर निकलने का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र में आय का निम्न स्तर होना है।
‘पलायन और विकास’ (साफा एवं टोहर) पुस्तक में लेखक द्वय लिखते हैं कि पलायन को सामान्यतः एक आर्थिक गतिविधि के रूप मेही देखा जाता है लेकिन कुछ गैर आर्थिक कारण भी इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। अधिकांश अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकला है कि पलायन कर्ताओं ने अपना मूल स्थान वहाँ आर्थिक संभावनाओं की कमी और अन्य स्थानों पर बेहतर अवसर की उम्मीद के चलते छोड़ा था।
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर होनेवाले पलायन के संबंध में पलायन का ‘बाहर धकेलने वाला सिद्धांत’ भी प्रयोग में लाया जाता है। ग्रामीण निर्धनता, जिसमें निम्न उत्पादकता, बेरोजगारी, अल्प रोजगार, आमदनी और उनभोग का निम्न स्तर सम्मिलित है, लोगों को शहरों की ओर धकेलती है।
‘योजना’ पत्रिका (13 सितम्बर 1964) के अंक में छपे श्री जी एन आचार्य के लेख के अनुसार योजना आयोग की शोध कार्यक्रम समिति के निर्देश पर नौ भारतीय शहरों बड़ौदा, हुबली, हैदराबाद, कानपुर, पूना, गोरखपुर, लखनऊ एवं सूरत में किए गए नमूना सर्वेक्षण से पता चला है कि ‘विपरीत आर्थिक परिस्थितियाँ’ पलायन का सबसे बड़ा कारण हैं।
इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार प्रणाली का बचा-खुचा अस्तित्व और पैतृक कानून जिनके कारण पारिवारिक भूमि और संपति का बँटवारा आसानी से नहीं हो पाता, भी पलायन का कारण हो सकते हैं। दूसरी ओर युवाओं में ‘स्वतंत्रता की इच्छा और बढ़ती हुईं महत्वाकांक्षाएँ’ भी पलायन के लिए प्रेरित कर रही हैं।
पलायन के प्रकार-
बुन्देलखण्ड में पलायन या जीविका प्रवास के सभी रूप दिखाई देते हैं। जो कि निम्नानुसार हैं।
1. दैनिक पलायन - गाँवों से षहरों और कस्बों में दैनिक मजदूरी या रोजगार के लिए हजारों व्यक्ति प्रतिदिन आते-जाते हैं। यह दैनिक पलायन करनेवाले मजदूर प्रायः वे होते हैं जिनके पास कृषि भूमि नहीं है या नाममात्र के लिए है। दूध और सब्जी आदि बेचने के लिए भी शहरों और कस्बों में हजारों व्यक्ति प्रतिदिन आते-जाते हैं। इनकी संख्या माँग और पूर्ति पर निर्भर रहती है। इससे गाँवों और शहरों की सामाजिक व्यवस्था पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है।
2. मौसमी या अस्थायी पलायन- इस प्रकार का पलायन कुछ विशेष ऋतुओं में ही होता है। बुन्देलखण्ड में यह चौत माह में होने से इस प्रकार के लोग ‘चैतुआ’ कहे जाते थे। इसकी अवधि अधिक नहीं होती। काम खत्म होते ही लोग घर वापिस आ जाते हैं। आजकल रबी या खरीफ की फसल बुबाई के बाद छोटे किसान और खेतीहर मजदूर काम के लिए मुख्यतः दिल्ली और पंजाब चले जाते हैं और फसल कटाई के समय गाँव लौट आते हैं।
3. आकस्मिक पलायन- कभी-कभी कुछ विशेष परिस्थितियाँ निर्मित होने से लोगों को अचानक पलायन करना पड़ता है। जैसे बाढ़, अग्निकांड, महामारी, अकाल आदि। ऐसी परिस्थितियों में सामान्यतः पलायन न करनेवाले परिवार भी आजीविका के साधन नष्ट हो जाने से काम के लिए पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं।
4. स्थायी पलायन- जब व्यक्ति सदैव के लिए घर-गाँव छोड़कर नगरों में बस जाते हैं तो इसे स्थायी प्रवास या पलायन कहते हैं। स्थायी पलायन कर चुके कई परिवारों की तो तीन-तीन, चार-चार पीढ़ियाँ परदेष में ही बीत गईं हैं। इन्दौर, भोपाल,
उज्जैन, जबलपुर आदि नगरों में ही ऐसे परिवार बड़ी संख्या में निवासरत हैं। इनमें से नई पीढ़ी का संबंध तो पूरी तरह मूल स्थान से टूट चुका है। दो-तीन दशकों से बुन्देलखण्ड में स्थायी पलायन में वृद्धि हो रही है। दिल्ली आदि महानगरों और पंजाब के बड़े नगरों में बुन्देलखण्ड के सैकड़ों परिवार स्लम बस्तियों में या अन्यत्र स्वयं के मकान बनाकर रहने लगे हैं। ये लोग मजदूरी के अलावा अन्य छोटे-मोटे काम-धंधे करने लगे है। ऐसे परिवार अब अपने मूल स्थान पर रिश्ते-नाते में होनेवाले विवाहादि मांगलिक अवसरों पर अथवा पूर्वजों तथा कौटुम्बिक देवताओं की पूजा के लिए अल्प समय के लिए ही आते हैं।
स्थायी प्रवास या पलायन के कुछ अन्य रूप भी हैं जिन्हें मोटे तौैर पर तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है।
(1) सुरक्षा हेतु पलायन- सत्तर और उसके पूर्व के दशकों में बुन्देलखण्ड दस्यु प्रभावित क्षेत्र रहा है। सम्पन्न परिवारों के घर डाका और अपहरण के बाद फिरौती की घटनाओं के कारण हजारों परिवार जान-माल की सुरक्षा और व्यवसाय के लिए गाँवों को छोड़कर निकटवर्ती नगरों में बस गए। इनमें से बहुत-से परिवारों ने अपनी पहचान और जन्मभूमि की स्मृति सुरक्षित रखने के लिए अपने नाम के साथ अपने गाँव का नाम जोड़ लिया है। इनके व्यावसायिक सूत्र आज भी गाँवों से जुड़े हैं।
(2) शासकीय/अशासकीय सेवा हेतु पलायन- स्वतंत्रता उपरांत शिक्षा के विकास और आरक्षण के फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों युवाओं को शासकीय सेवा में आने का अवसर प्राप्त हुआ। इनमें से अधिकांश कार्यस्थल पर रहने की बाध्यता के कारण अपने-अपने कार्यक्षेत्र में ही बस गए हैं। वर्तमान में इलैक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में उच्च शिक्षा प्राप्त युवा अपने घरों से दूर महानगरों में कार्य कर रहे हैं।
(3) शिक्षा हेतु पलायन- वर्तमान में अन्य क्षेत्रों की तरह बुन्देलखण्ड में भी गाँवों से नगरों और नगरों से महानगरों की ओर पलायन या प्रवास का एक रूप शिक्षा हेतु पलायन है। बच्चों की अच्छी एवं उच्च षिक्षा के लिए ग्रामीण और छोटे शहरों में शासकीय सेवा में कार्यरत कर्मचारी और अधिकारी नगरों और महानगरों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। जो कर्मचारी नगरों/महानगरों में स्थानान्तरण में सफल नहीं हो सके हैं, उन्होंने अपने घर जिला या विकासखण्ड मुख्यालयों पर बनबा लिए हैं और अपने ग्रामीण कार्यस्थल पर नित्य आना-जाना (अप-डाउन) करते हैं।
पलायनः बदलती प्रवृति-
बुन्देलखण्ड में पलायन की परम्परा कोई नई नहीं है। इस क्षेत्र के निर्धन वर्ग जिसमें दलित और पिछड़ा वर्ग के ही नहीं कथित सवर्ण जातियों के स्त्री-पुरुष भी हुआ
करते थे, कृषि मजदूरी या चैत काटने के लिए पारम्परिक रूप से कृषि क्षेत्रों में ही जाते रहे हैं। तत्कालीन परिस्थितियों में इसे असम्मानजनक भी नहीं माना जाता था। ऐसे कोई प्रमाण नहीं जिससे यह सिद्ध होता हो कि कृषि मजदूरी के अतिरिक्त इस क्षेत्र से बड़े स्तर पर आजीविका के लिए महानगरों की ओर पलायन किया हो। अब इस प्रवृत्ति में परिवर्तन दिखाई देता है। जो इस प्रकार है।
वर्तमान परिस्थितियों में जो पलायन हो रहा है वह परम्परागत पलायन से अलग है। आज जो पलायन है उसे आर्थिक बदहाली के कारण होनेवाले पलायन के रूप में देखा जा सकता है। यह बदहाली चाहे प्राकृतिक कारणों से हो,चाहे व्यवस्थागत अथवा सामाजिक।
पहले पलायन की अवधि दो से तीन माह हुआ करती थी अब वह आठ से दस महीने तक हो गई है।
युवा वर्ग अब पलायन को सामाजिक बदलाव, नये विकल्प और नये अवसरों की खोज के रूप में देखने लगा है।
पलायनः प्रभाव और परिणाम-
1. पलायन मात्र एक आर्थिक समस्या ही नहीं है। इसके दूसरे सामाजिक, सांस्कृतिक, जनांकिकीय, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव भी हैं।
2. पलायन के कारण जनसंख्या का वितरण कृत्रिम रूप से प्रभावित होता है।
3. नगरों में जनसंख्या में अनियंत्रित वृद्धि होती है।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यसक्षम जनसंख्या में कमी आ रही है।
5. बच्चों का शैक्षणिक गुणवत्ता स्तर गिर रहा है।
6. बहुत-से बच्चे शाला त्यागी हो जाते हैं या उच्च माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
7. नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है।
8. लोक संस्कृति का क्षय हो रहा है।
9. एड्स जैसे भयानक रोगों का फैलाव होता है।
10. अपराधों में वृद्धि।
11. नगरों में कानून और प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त भार बढ़ जाता है।
12. नगरों में सुविधाविहीन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों का विस्तार।
13. भाषाई और क्षेत्रीय संतुलन पर नकारात्मक राजनीति होना।
14. वृद्ध जनों के भरण-पोषण और देखभाल की समस्या उत्पन्न होना।
15. संकीर्ण दलीय हितों के लिए राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अवहेलना।
16. बच्चों और महिलाओं का शोषण।
17. आंतरिक भारतीय प्रवासियों की आड़ में पड़ौसी देशों के घुसपैठियों को मौका।
18. नगरों में बढ़ी हुई जनसंख्या के कारण विकास योजनाओं के स्थान पर मूलभूत सुविधाओं पर धन का व्यय।
19. पलायनकर्ता के समक्ष असुरक्षा के अलावा एक और संकट है, वह है पहचान का संकट।
20. पलायनकर्ता अपने कार्यस्थलों पर मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गुजारा कर रहे हैं।
21. स्थानीय और प्रवासी लोगों में सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक तनाव।
22. ‘कोविड-19’ जैसी महामारियों में अचानक आजीविका का संकट खड़ा होना।
पलायनः सामाजिक समाधान-
पलायन एक बहुपक्षीय समस्या है। इन सभी पक्षों को लेकर बनाई गई कोई एकीकृत योजना ही इस समस्या का सर्वमान्य समाधान हो सकती है। ऐसी एकीकृत योजना शासन द्वारा बनाई गई कोई उच्चाधिकार प्राप्त विषेषज्ञ समिति ही बना सकती है। समस्या के समाधान हेतु कुछ सुझावों पर विचार किया जा सकता है।
1. पलायन को समस्या के रूप में नहीे समाधान के रूप में देखने की आवश्यकता है।
2. सामाजिक समरसता के साथ-साथ पारिवारिक समरसता को बढ़ावा देना।
3. कृषि को लाभदायक व्यवसाय के रूप में बदलना।
4. रोजगारपरक लघु उद्योगों को बढ़ावा देना।
5. कुटीर एवं लघु उद्योगों को कम ब्याज या ब्याज रहित तथा
अनुदान रहित ऋण उपलब्ध कराना
6. ऋण का वास्तविक उपयोग सुनिष्चित कराना।
7. मिश्रित खेती अपनाना (कृषि के साथ-साथ डेरी उद्योग,
मत्स्यपालन, भेड़-बकरी पालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन
आदि)
8. औषधीय फसलों एवं मोटे अनाज का उत्पादन एवं उन पर
आधारित व्यवसायों/उत्पादों की व्यवस्था सुनिश्चित करना।
9. अस्थाई पलायन करनेवाले परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए
आवासीय शिक्षा सुविधाओं का विस्तार किया जाना।
10.ग्रामीण क्षेत्रों में आठ-दस कि.मी. के अंतराल पर किसी गाँव को एक ऐसी कॉलौनी या उप नगर के रूप में विकसित करना जिसमें उस क्षेत्र में सभी शासकीय सेवक रह सकें। जहाँ आवास, बिजली-पानी, मनोरंजन के साधन, बाजार, इंटर या कॉलेज स्तर की स्तरीय शिक्षा सुविधा आदि हों तथा कॉलौनी की आवश्यकताओं की पूर्ति निकट के गाँवों से हो सके ऐसी व्यवस्था करना।
1. शोध आलेख की सीमाएँ-
2. बुन्देलखण्ड की सीमा या क्षेत्र स्पष्टरूप से परिभाषित/प्रमाणित नहीं है। ये सीमाएँ सांस्कृतिक/भाषाई, राजनीतिक (पूर्व बुन्देला राजाओं के अधीन/विजित प्रदेष), प्रशासनिक के रूप में एकमत नहीं हैं।
3. बुन्देलखण्ड दो राज्यों उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में विभाजित है।
4. सांख्यिकीय आँकड़े राज्यवार या जिलेवार ही उपलब्ध हैं। इंटरनेट से प्राप्त आँकड़ों की पुष्टि संभव नहीं है।
5. पलायन के बारे में शासकीय और गैर शासकीय धारणाएँ, कारण और तथ्य अलग-अलग हैं।
6. पलायन की दर स्थिर नहीं है।
-रामगोपाल रैकवार टीकमगढ़
बुन्देलखण्ड में प्राकृतिक संसाधन और विकास की संभावनाएँ
-डॉ. बहादुर सिंह परमार
बुन्देलखण्ड एक सांस्कृतिक इकाई है जिसकी भौगोलिक सीमा सामान्यतः यमुना से नर्मदा और चंबल से टोंस नदियों के मध्य के भू-भाग को स्वीकारा जाता है। इस अंचल में प्राप्त शैलचित्रों तथा अन्य प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि यहाँ आदिकाल से मानव का वास रहा। इस अंचल की संरचना गिरि-पर्वत कंदराओं से मुक्त वनाच्छादित रही है जहाँ सरिताओं में पवित्र जल प्रवाहित हो जनमन तथा पषु-पक्षियों को प्रमुदित करता रहा है किंतु विगत कुछ दशकों से बुन्देलखण्ड को राष्ट्रीय परिदृश्य पर इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि यह कंगाल क्षेत्र है, जहाँ केवल गरीबी, जहालत, अशिक्षा तथा अत्याचार का बोलबाला है जबकी यह वास्तविकता नहीं है।
लोगों के देखने के अपने-अपने दृष्टिकोण है। यह अंचल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से युक्त प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज, अपनी मस्ती में जीने वाला क्षेत्र है। केवल भौतिक संपन्नता आनंद का पैमाना नहीं हो सकता लेकिन उसे ही प्रमुखता देने वालो को मैं अवगत कराना चाहूँगा कि यह अंचल प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न है, इसमें विकास की अपार संभावनाएँ है। इसके संसाधनों का दोहन न होकर अत्यधिक षोशण हो रहा है, विकास व्यवथित न होकर असंतुलित हो रहा है जिससे कई समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।
सबसे पहले हम बुन्देलखण्ड में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर विचार करें तो पाते हैं कि यह अंचल अपने आप में प्राकृतिक संसाधनों से भरा पड़ा है। यह देष का इकलौता क्षेत्र है जहाँ हीरे की खदानें हैं। यह पन्ना के साथ छतरपुर जिले के दक्षिणी भाग में पाया जाता है। भूगर्भीय सर्वेक्षण में अभी यूरेनियम पाए जाने की संभावना बताई गई है जबकी ग्रेनाइट तथा डोलोमाइट की खदानों की भरमार है। छतरपुर, महोबा, ललितपुर, झाँसी तथा टीकमगढ़ जिले में उन्नत क्वालिटी का ग्रेनाइट पाया जाता है।
छतरपुर जिले की बिजावर तहसील में लौह अयस्क के भंडार दबे पडे है। इनका खनन स्वतंत्रता पूर्व तक बिजावर नरेश कराते रहे किंतु आजादी प्राप्त होने पर यह खदान बंद है। इन खनिजों के अतिरिक्त नदियोंमें रेत भी प्रचुरता से उपलब्ध है यहाँ के मैदानी इलाकों की मिट्टी काली तथा दोमट है जो काफीउपजाऊ है किंतु पहाडी तथा पठारी इलाकों में लाल मिट्टी पाई जाती है। बुन्देलखण्ड में केन, बेतवा, धसान, चंबल, उर्मिल, काठन, सुनार, जमडार, तरपेड जैसी नदियाँ हैं जिनमें भरपूर जल आता है किंतु इनका सही उपयोग नहीं हो पा रहा है।
पूरा बुन्देलखण्ड पहाडियों, टौरियों, पर्वतों, घाटियों के बीच वन क्षेत्र में बसा है। पन्ना, टीकमगढ़, सागर, छतरपुर, दमोह के साथ महोबा, चित्रकूट जिलों में वन क्षेत्र विविधता के साथ पषु-पक्षियों की सैकडों प्रजातियाँ अपना आश्रय बनाए हुए है। उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों में सक्रिय संसाधन मानव है जो चेतन तथा क्रियाषील है। उपलब्ध आँकडों से बुन्देलखण्ड का मानव संसाधन स्किल्ड न होकर साधारण कोटि का है।
यहाँ की अधिकांष जनसंख्या कृषि पर रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर मजदूरों का प्रवास यहाँ की प्रमुख प्रवृत्ति है। इसके साथ इस अंचल की भौगोलिक अवस्थिति विशिष्ट है। यह भारत देष के मध्यवर्ती क्षेत्र में है, जहाँ से गुजरे बिना सीधे उत्तर से दक्षिण या पूर्व से पष्चिम नहीं जाया जा सकता है।
भौतिक विकास पर दृश्टिपात करें तो ऐसा नहीं है कि यहाँ विकास नहीं हुआ है। पूरे राश्ट्र के साथ यहाँ भी विकास की किरणें आई हैं। हमने सिंचाई का रकबा बढ़ाया है, हीरा खनन परियोजना लगाई है, ग्रेनाइट तथा डोलोमाइट का खनन किया है। षहरों का विकास किया है। षिक्षा व स्वास्थ्य की सुविधाओं में वृद्धि हुई है। सागर, झाँसी, छतरपुर में विष्वविद्यालय स्थापित किए हैं किंतु जिस गति से विकास अपेक्षित था, वह नहीं प्राप्त की जिससे हमारे उपर पिछडे होने का टैग लगा दिया जाता है।
इसके लिए कुछ नियोजित प्रयास अपेक्षित है-
1. कृशि उपज आधारित उद्यमों की स्थापना/ग्रामोद्योग
2. वनापज संग्रहण तथा विक्रय को प्रोत्साहन
3. हीरा तथा ग्रेनाइट पालिषिंग प्लांट की आवष्यकता
4. स्किल्ड मानव संसाधनों को प्रोत्साहन
5. स्थानीय लधु सिंचाई संरचनाओं की जरूरत
6. पर्यटन को प्रोत्साहन
7. श्रम की महत्ता को स्थान
बुन्देलखण्ड अँचल में कृषि उपज आधारित वृहद तथा मध्यम दर्जे की औद्योगिक इकाइयों की स्थापनाओं के माध्यम से उपलब्ध कृषि उपज का रूपपरिवर्तन कर हम आर्थिक उन्नति कर सकते है। उदाहरणर्थ- टमाटर, आलू तथा सोयाबीन, चना आदि से बनने वाली खाद्य सामग्रियों के निर्माण हेतु फूड प्रोसिसिंग यूनिट्स से कृशकों को उपज का सही मूल्य मिलने के साथ स्थानीय बेरोजगारी घटेगी। वनोपज संग्रह करके औशधीय जडी-बूटियों का उपयोग करने वाले प्लांट लगना चाहिए।
यहाँ से आँवला, हर्र, बेर, बेल तथा महुआ बडी मात्रा में बाहर जाता है। इन वस्तुएँ के उपयोग आधारित इकाइयों से क्षेत्र को लाभ पहॅचेगा। हीरा खनन पन्ना में होता है और उसको सूरत में तरासा जाता है। इससे लाखों लोगों को सूरत मे रोजगार मिलता है, इसके स्थानीय स्तर पर कटिंग-पालिसिंग यूनिट्स के लगने से विकास की दर बढेगी। यही हाल ग्रेनाइट का है। यहाँ से ग्रेनाइट की सिल्लियाँ अंचल से बाहर जाकर कटती तथा चमकती हैं।
यहाँ उपलब्ध मानव संसाधन को स्किल्ड करने हेतु औद्योगिक प्रषिक्षण संस्थाओं के साथ अभियांत्रिकी महाविद्यालयों तथा अन्य तकनीकी प्रषिक्षण संस्थाओं की स्थापना अपेक्षित है। जिससे मानव संसाधन का समुचित उपयोग विकास में हो सके। बुन्देलखण्ड की कृशि अभी भी बहुतायत में मानसून आश्रित है। सिंचाई के संसाधनों का अभाव, सूखा तथा बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से किसान परेषान होता रहता है।
भू-जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसके वृद्धि हेतु स्थानीय स्तर पर लघु जल संरचनाएँ बनाने की जरूरत है। खेत का पानी खेत में तथा गाँव का पानी गाँव में रोकने का प्रयास करना चाहिए जिससे सिंचाई के साथ सूखा आदि से आसानी से निपटा जा सकता है।
पर्यटन ने आज उद्योग का रूप ले लिया है। बुन्देलखण्ड में खजुराहो, ओरछा, झाँसी, चित्रकूट, पन्ना, सागर, जटाषंकर, कुण्डेष्वर, दतिया, कालिंजर तथा बाँदा जैसे स्थल है, जहाँ पर्यटक आते है। इसके साथ पन्ना राश्ट्रीय उद्यान के साथ कई अभयारण हैं जहाँ पर्यटक आते है। इसके साथ अन्य स्थलों को विकसित करने की आवष्यकता है।
उदाहरणार्थ छतरपुर जिले का मउसहानियाँ, पन्ना जिले का अजयगढ़, दमोह जिले का हटा व बादकपुर, टीकमगढ़ जिले का गढ़कुण्डार आदि। यहाँ पर्यटकों को आकर्शित करने के लिए प्रयास होने चाहिए। जल आधारित पर्यटन भी पर्यटकों को बाँधनें में प्रोत्साहित किए जा सकते है। इसके साथ बुन्देलखण्ड के विकास में जो बाधा दृश्टिगत होती है, वह है यहाँ की आलस्य प्रवृत्ति, आपसी ईश्यातथा मस्तमौलापन। लोग कम आमदनी में रहकर संतोशी होकर जी लेता है। इस मानसिकता को बदलने की आवष्यकता है।
निश्कर्शतः कहा जा सकता है कि बुन्देलखण्ड में उपलब्ध भरपूर प्राकृतिक संसाधनों का नियोजित दोहन किया जाए तो यह अंचल अपनी आर्थिक समृद्धि में उत्तरोत्तर वृद्धि करेगा।
डॉ. बहादुर सिंह परमार
सह प्राध्यापक हिन्दी
शासकीय महाराजा महाविद्यालय
छतरपुर
मोबाइल-9425474662
महराज महाराजा छत्रसाल की काव्य तन्मयता -अभिनन्दन गोइल
बुन्देलखण्ड केषरी महाराजा छत्रसाल एक महान योद्धा होने के साथ साथ एक सुकवि भी थे। यह बात अपने आप मे बडी विरोधाभासी लगती है कि जिस योद्धा के पैर धोडे की रकाब पर से नही हटे और जिसने निर्जन उपत्यकाओं और बिहड जंगलो मे अपना अधिकांष जीवन बिताया हो उसके हृदय से कैसे काव्य धारा फुट सकती है ? अपने खंड्ग की धार पर विजित विषाल बुन्देलखण्ड के षासक, प्रजा का पुत्रवत लालन पालन करने वाले न्याय प्रिय, दीन-षरणागत के रक्षक परमपुरूषार्थी महाराजा छत्रसाल के हृदय से प्रेम और भक्ति की निर्झनी काव्य रूप मे प्रस्फुटित हुई जो हमे आश्चर्य चकित करती है। ’’छत्रसाल ग्रंथावली’’ के संपादक श्री वियोगी हरी जी उक्त ग्रंथ की भूमिका मे कहते है कि ’’लक्ष्मी, काली और सरस्वती इन तीनों महाशक्तियों की साधना एक साथ ही किसी साधक से बनी है तो वह बुन्देलखण्ड का रक्षक वीर शारर्दुय छत्रसाल है। महाराजा छत्रसाल का काव्य श्रजन प्रमुखः ब्रज भाषा मे है अवधी और बुन्देली के बहुत थोडे शब्द उनकी रचनाओ मे प्रयुक्त हुए है। कुछ पद्यों मे फारसी के भी शब्द आए है तथा एकाध पद्य खडी बोली का भी पाया जाता है। भाषा अंत्यत शुद्ध और मधुर बन पडी है। महाराजा छत्रसाल की कविता मे छंद विधान अधिकांशः शुद्ध है। श्री वियोगी हरि के अनुसार ’’ यति भंग दोष अन्य कवितयों की अपंज्ञा इन्होंने बहुत कम किया है। प्रतीत होता है कि इन्हें छंद शास्त्र का अच्छा ज्ञान था।’’
इन्होंने कवित्त ही अधिक लिखे है। ’श्री कृष्ण कीर्तन’ का मंगलाचरण और उपसंहार दोहा छंद मे है कतिपय सवैया कुंण्डलिया और छप्पयछोर पूरा श्रीकृष्ण कीर्तन कवित्त मे ही है। इनके द्वारा रचित ’’रामयश चंद्रिका’’ मे कुछ सविया छोड कवित्त ही कवित्त है। परंतु उपसंहार दोहो से किया है। ’’हनुमत विनय’’ मे उनके द्वारा रचित छंदो की विविधता आश्चर्य चकित करती है। इस कृति के मात्र 37 पदों मे मल्ली, मदिरा, गंगाधर, मकरंद, डमरू, हरसाद, सारणी, मुक्त हरा, चंद्रकला, सुन्दरी, कवित्त लया, अभार, क्रीट, डंडक, सुधा, मंतगयंग, हांसी , दीर्ध और दोहा जैसे 20 छंदो का प्रयोग हुआ है। अक्षर अन्नय के प्रश्न और किनको उत्तर, नीति मंजरी तथा फुटकर पद्यों आधिकांशः कवित्त ही है।
’’श्री कृष्ण कीर्तन का निम्मलिखित पद देखे, लालित्यपूर्ण शिल्प के साथ कितना मोदमयी भाव गोविन्दजू के गुणगान मे प्रगट हुआ हे-
देखो री देखौ, इन फूलन पै भ्रमै भौर,
उडै दौर दौरि डार डार रसि चारिकै,
गायत हैं गंूजि-गंूजि गुननि गोविंद जू के,
छत्रसाल कुंजनि में ललित कदम्ब फूले,
तरून तमाल राजि राजति छहरिकैं।
मोन बिलोकैं, ते बिलोकैं मनमोहन को,
स्वर्ग के हिात तक आप कां निदरि कैं।।
(श्रभ्कृश्ण कीर्तन/32)
कला सौंदर्य में स्नात ’ श्री रामयश चंद्रिका’ मे प्रगाढ भगवत प्रेम और भक्तिभाव अद्भुत आनंद की सृष्टि करता है-
मेरे नैन जुगल चकोर राम राका ससि
काय-मन-वचन बिलोकि सुख पावैगे।
अंग अंग अमित अनंग छवि देखि देखि,
द्वंद दुख भंजि आनंद बढाबैगे।।
छत्रसाल मानस-नदीस बीस बिसे आजु,
अमिय अमंग चारू चखनि चखाबैगे।
मोह भ्रम जनित बिदारि तम तोम अब,
सीता-वर-चंद उर मंदिर बसाबैगे।।
(श्री रामयश चंद्रिका/12)
विविध छंदो मे सृजित ’हनुमत विनय’ मे तो महाराज छत्रसाल की विनय और भक्ति का अद्भुत परिपाक उन्हें श्रेष्ठ भक्त कवि के रूप मे प्रतिष्ठित करता है। डमरू छंद मे पिरोये भक्ति भाव का निम्न पद मे अवलोकन करे-
गिरिधर गिरि-चर प्रभुवर-उर-धर,
रधुवर-चर-वर, जयजयजय-कर
जय जय-रज-धर, जय-धुज-कर-धर,
जय जय जसधर जय भव -भय हर।।
जयति विजय-धुज, छतहिं करहुं कुज,
जयति जयति अज। जय मन मन भर।
जय जय पवन तनय त्रिभुवन कह,जय प्रनमत सब पद सिर धर-धऱ
दीन-हीन-शरणागत रक्षक महाराजा छत्रसाल ने न्याय और नीति से ही राज्य किया था। ’नीति मंजरी के 34 पदों में धर्म पुरूषार्थ के साथ ही राज कात चलाने की प्रेरणा मिलती है। देखिये निम्न कवित्त मे नीति कथन के साथ महाराज की दोनों के प्रति कैसी करूणा विगलित हुई है
अगम अनादि जासु सुनत फिरादि दादि,
होत है सहाय भाय अंतर कौ पालबो।
तासों राजनीति में अनीति कहौ कौन करै,
छत्रसाल भाखतु है वेदनि कौ गायबो।।
जापै कोउ निबल पै सबल जनाबै जोर,
ताकौ मद टोरि आपु करै जन-भायबो।
मानियौ रे, मनुज विचारि उर आनियौ रे,
जानियौ रे, गजब गरीब कौ सतायबो।।
(नीति मंजरी/2)
महाराज छत्रसाल के फुटकर पद्य भी बहुत अर्थपूर्ण और सुन्देर बन पडे है। निम्न कवित्त उनकी गहन आध्यात्मिक पैठ को निरूपित करता है।
ईसुर अनीसुर मे अंतर अंनत ऐसो,
जैसे मित्र चित्त कौ न करत उदोतु है।
उदर निमित्त कोउ नित्त को अनित्त कहै,
कोउ परवित्त काज बन्यौ ब्रहम गोतु है।।
कहै छत्रसाल, जैसे भक्ति बिन ज्ञान है,
ध्यान बे-विराग, जैसे पानी बिन पोतु है।
तैसहिं विचारू चारू माया कौ प्रचारू सर्व,
हंस बसु नाहि पर्महंस कैसे होतु है।।
महाराज छत्रसाल के समकालीन संत अक्षर अनन्य जू द्वारा सर्वया छंदो में छत्रसाल से किये आध्यात्मिक प्रश्न और महाराज के उन्हीं छंदो में उत्तर भी उनकी गहन आध्यात्मिक रूचि को दर्शात है।
निश्चित ही महाराज छत्रसाल प्रेम और भक्ति के अनूठे कवि थे। मै श्री वियोगी हरि के ही शब्दों से अपनी बात का उपसंहार करता हूॅ ’’महाराज छत्रसाल एक उचे कवि थे । प्रेम और भक्ति इनकी रचनाओ में कूट कूट भरी है। रचनाओं में तन्मयता की अच्छी मात्रा है। इनकी दृष्टि निसंदेह कवि दृष्टि थी।।’’
-अभिनन्दन गोइल
बुन्देलखण्ड़ के प्रसिद्ध कुल एवं लोक देवता
यँू तो हिन्दू धर्म में तेतीस कोटि देवताओं के होने का उल्लेख मिलता है, लेकिन इनके अलावा भी कुछ प्रसिद्ध प्राचीन लोक देवताओं भी बुन्देलखण्ड़ में बड़े आदर के साथ पूजे जाते हैं। जो अपने अपने क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय हैं गाँव के साथ.साथ ये लोक देवता शहरांे मंे भी हर समाज के लोगों द्वारा पूजे जाते हैं।
किसी भी मांगलिक कार्य विशेषकर त्यौवहारों एवं शादी.विवाह के अवसर पर इन लोक देवताआंे की पूजा का बिशेष ध्यान अवश्य रखा जाता है। अन्यथा ऐसी मान्यता है कि इन मांगलिक मौके पर यदि इनकी पूजा न की गयी तो ये लोक देवता नाराज हो जाते हैं और फिर घर.परिवार में कुछ न कुछ अनिष्ट हो ही जाता है। इसीलिए ऐसा अक्सर लोगों के द्वारा देखने एवं सुनने में मिलता है किए आज हमारे घर में हमारे कुलदेवता या लोक देवता की पूजा होना है।
यह पूजा बुन्देलखण्ड़ के लगभग प्रत्येक परिवार में वर्ष के कम-से-कम एक बार तो जरूर देखने को मिलती है और इस पूजा की खास बात यह है कि इस पूजा में घर का प्रत्येक सदस्य जरूर शामिल होता है चाहे वह घर से कितनी दूर क्यों न रहता हो, वह इस पूजा के लिए घर जरूर आता है। बुन्देलखण्ड़ में इन लोक देवताओं के नाम का एक चबूतरा बनाया जाता है और इसी चबूतरे को प्रातीक मानकर इनकी पूजा अर्चना की जाती है तथा प्रसाद चढ़ाया जाता है।
अपने परिवार को मुसीबतों से बचाने के लिए इन लोक देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तरह-तरह के रीति रिवाज प्रचलित है कुछ लोग तो इनसे मनौती माँगते है एवं मनौती पूरी होने पर लोक देवताओं के चबूतरे के सामने उनकी पूजा दी जाती है। कोई भी ग्रामीण तो क्या शहर तक के लोग भी अपनी तो खूब झूठी कसमें तो खा सकते है परंतु कभी भी किसी भी कीमत पर नहीं इन लोक देवताओं की झूठी कसमें नही खा सकते।
बुन्देलखण्ड़ के लोग अपनी संपन्नता, तरक्की और प्रसिद्धी को अपने लोकदेवता की कृपा एंव आशीर्वाद मानते हैं इसीलिए तो उनके घरों एवं वाहनांें पर उनके कुलदेवता का नाम जरूर लिखा देखा जा सकता है। पूरे वाहनांें पर उनके कुलदेवता का नाम जरूर लिखा देखा जा सकता है। पूरे बुन्देलखण्ड के हर जिले में एवं ग्रामीण क्षेत्रों में अपने-अपने क्षेत्र बिशेष के कुल देवता प्रसिद्ध है।
कुछ प्रसिद्ध देवताओं की ख्याति तो बहुत दूर-दूर तक है। एक अनुमान के मुताबिक इनकी संख्या सौ से ऊपर है। वैसे इन लोकदेवताओं का कोई प्रामाणिक छवि नहीं है और न ही इनके जन्म-मृत्यु संबंधी कोई जानकारी का कहीं भी उल्लेख हमें देखने को मिलता है लेकिन गाँव में खेत या घर के आँगन आदि पवित्र स्थान में इनका एक चबूतरा बनाकर उनका अदृश्य रूप ही पूजा जाता है। कहीं-कहीं पर उस चबूतरे पर कोई गोल-सा छोटा-बड़ा पत्थर रखकर उन्हें इन देवताओं का प्रतीेक मान लिया जाता है और उसी रूप में इनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
शहरों में आँगन आदि स्थानों की कमी रहती है तो वहाँ पर उन्हें एक अलग कमरे में या फिर पूजाघर में स्थापित कर दिया जाता है और वहीं पर उनके नाम का स्मरण करते हुए पूजा अर्चना आदि की तथा हवन आदि में उनके नाम की कुछ आहुतियाँ दी जाती है। वैसे मुख्य रूप से अगरवत्ती हल्दी,चावल एवं खड़ा धनिया आदि का छिटकन देकर उन्हें नारियल ही चढ़ाया जाता है।
घर पर कोई भी मांगलिक कार्य होने पर अपने कुल देवता को स्मरण करते हुए उनके नाम की छिटकी जरूर चढ़ाई जाती है वर्ना ये कुलदेवता बहुत जल्दी नाराज भी हो जाया करते है।
साल में एक वार एक विशेष प्रकार की पूजा भी की जाती है जिसे बुन्देलखण्ड़ी में ‘मैर’’ की पूजा कहा जाता है यह पूजा प्रायः हर हिन्दू हर घर में अवश्य की जाती है जिसमें प्रसाद के रूप में एक बिशेष प्रकार की आटे की छोटी-छोटी गोली होती है जिसे आम बोलचाल में ‘गुलेरी’् कहा जाता है।वह भी अवश्य बनायी जाती है जो कि घर की बड़ी बुर्जग महिला के द्वारा ही बनायी जाती है। जिसे पूजा पूरी होने पर प्रसाद के रूप में घर के प्रत्येक सदस्य को कम से कम एक कटोरी भर कर या एक मुठ्ठी भर दिया जाता है यह गुलेरी का प्रसाद केवल घर के सदस्यों को ही दिया जाता है अन्य किसी बाहर के आदमी को यह प्रसाद नहीं दिया जाता है चाहे वह कितना की घनिष्ट क्यांे न हो। वैसे कही.कही पर इस पूजा को ‘बाबू की दोज’ भी कहा जाता है।
आटे की छोटी-छोटी गोली बनाने के बाद इन ‘गुलेरी’ को कढ़ाई में तेल में निकाला जाता है उसे कढ़ाई में तलने का काम हर कोई के बस की बात नहीं होती है, उसे घर की बुजुर्ग महिला जो घर की मालकिन भी होती है, वह ही निकाल पाती है और कभी-कभी तो शुद्धता आदि का ध्यान नहीं रखा गया तो तेल में निकाला जाता है उसे कढ़ाई में तलने का काम हर कोई के बस की बात नहीं होतीहै, वह ही निकाल पाती है और कभी-कभी तो शुद्धता आदि का ध्यान नहीं रखा गया तो तो ये गुलेरी कढ़ाई में डालते ही दूर-दूर तक छिटक जाती है तब ऐसा माना जाता है किए कुछ-न-कुछ गलती जरूर हो गयी है और कुल देवता नाराज हो गए हैं। इसे ‘मेर फूटना’ कहा जाता है। इसे बड़ा ही अशुभ माना जाता है फिर कुल देवता से अज्ञानतावश हुई भूल के लिए माफी माँगी जाती है तथा फिर से नये तेल में उन्हें पूरी शुद्धता के साथ घर के किसी दूसरे के हाथ से गुलेरी निकाले का कार्य कराया जाता है।
कुछ लोग गाँव में अपने कुलदेवता के नाम का ‘गढ़ा’ एक प्रकार का काला या लाल रंग का धागा भी बाँधते है जो कि खास तौर पर जब बाँधा जाता है जब घर में किसी की तबियत अचानक खराब हो गयी हो या कोई ऊपरी हवा आदि का चक्कर हो या फिर किसी महिला के बच्चे होना हो तब उस महिला को ये गढ़ा इस उम्मीद से बाँधा जाता है कि हमारे कुल देवता जच्चा और बच्चा दोनों की रक्षा करंेगें।कभी-कभी घर के किसी सदस्य की अचानक रात में बहुत तबियत खराब हो जाती है या पेट आदि में तेज दर्द होने लगता है तो इतनी रात में डॉक्टर के पास नहीं जा सकने के कारण घर के लोग अपने कुल देवता के नाम की ‘भभूत’ उस पीड़ित को थोड़ी खाने को दे देते है और थोड़ी सी उसके सर पर भी लगा देते हैं। हमें आश्चर्य तो तब होता है जब कोई हमें यह सुनाता है कि हमें उस भभूत से उसे आराम मिल गया था। गाँवों में तो ऐसा अक्सर ही सुनने में मिल ही जाता है।
बुन्देलखण्ड़ के कुछ प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय कुल एवं लोक देवताओं के नामरू. बुन्देलखण्ड़ के कुछ प्रसिद्ध एंव लोकप्रिय लोक देवता या इन्हें कुलदेवता भी कहा जाता है इस प्रकार हैः-
1 बीजासेन 2 घटौरिया बाबा 3 पीर बाबा 4 पठान बाबा 5 मेहतर बाबा 6 रक्कस बाबा 7 नट बाबा 8 कारस देव 9 खाती बाबा 10 कुलदेवता 11 गौड़ बाबा 12 सती चौरा 13 कल्याण सिंह बाबा 14 वरम देव 15 हरदौल 16 भैसासुर 17 आसमाई 18 दरयाव सिंह बाबा 19 गेंवड़े के देवता 20 खैरापति 21 गौसाइन माता 22 गौसाई बाबा 23 वर्वरीक 24 गौड़देव25 मेहर बाबा 26 बड़ी माता 27 छोटी माता 28 भगवंतपुरा के बब्बा 29 अब्दापीर 30 खेरे वारे आदि।
कुछ तो सत्यता इन लोक देवता एवं कुल देवताआंे में अवश्य है तथा उनका भी कोई न कोई वजूद अवश्य है तभी तो वे आज भी हमारी अनेक पीढ़ियों से निरन्तर पूजे जा रहे है। ये कुल देवता हमारे आस्था का केन्द्र बने हुए है।आज भी प्रत्येक घर में ये आदर के साथ पूजे जाते है और गाँवों में तो इन्हें सबसे पहले ही पूजा जाता है फिर अन्य प्रमुख देवताओं को। हम प्रत्येक शुभअवसर पर उन्हंे याद करते हुए उनका आशीर्वाद अवश्य लेते हैं।
-राजीव नामदेव राना लिधौरी
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शिक्षाविद, वरिष्ठ साहित्यकार डॉक्टर कैलाश बिहारी जी द्विवेदीकुछ पुष्प सुमन अर्पित
11 अगस्त 1930 को सागर में जन्में बानपुर ललितपुर उत्तर प्रदेश से एवं कर्मभूमि टीकमगढ़ के वरिष्ठ साहित्यकारए लेखकएभाषाविदए समालोचक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का जीवन हम आप सबने देखा मगर उसके साथ उनके प्रारम्भिक जीवन संघर्ष की यदि चर्चा न की जाए तो ये उनके साथ अन्याय ही होगा।
मैं दुष्यन्त कैलाश द्विवेदी उनका द्वितीय पुत्रए पुत्र ही नहीं बल्कि वे मेरे पिता होने के साथ मेरे गुरु भी थे ये सुखद संयोग भी कम लोगों को ही प्राप्त होता है मगर मेरा सौभाग्य है कि मुझे मिला।
मेरे पिताजी द्वारा जो मुझे बताया गया अपने बारे में उसे कुछ हद तक आप सबके बीच रखने का प्रयास करता हूँ। पिताजी की मात्र 11 वर्ष की उम्र थी जब उनसे पिता का सानिध्य छिना चूंकि वे अपने भाई बहन से बड़े थे तो घर परिवार की एकदम से जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई हमारे दादा जी राजमहल में कार्यरत थे लिहाजा घर की माली हालत भी दयनीय थी फिर ऊपर से इनकी इतनी छोटी उम्र कमाने की भी नहीं थी तो परिवार ने ऐसे में बहुत जबरदस्त आर्थिक तंगी झेली मगर टीकमगढ़ में उनके बड़े भाई जैसा स्नेह करने वाले स्व श्री छन्नू लाल जी तिवारीए स्व श्री सरदार सिंह जी पूर्व विधायक एवं स्व श्री शंभु दयाल जी दीक्षित का सानिध्य मिला तो इन लोगों ने तत्काल सहायता के रूप में कांग्रेस कार्यालय में कुछ काम दिलाया और ऐसी व्यवस्था की कि रोज पैसा मिलता रहे जिससे घर में दोनों समय का भोजन तो बन सके भले ही रूखा सूखा हो लेकिन पेट तो भरा जा सके इसी व्यवस्था के तहत खुद की पढ़ाई छोटे भाई और बहन की पढ़ाई का भार भी उठाया और जैसे तैसे भरण पोषण के साथ पढ़ाई भी जारी रखीचूंकि अंग्रेजों का शासन था और उनके आतंक व क्रूरता के चलते देश से खदेड़ने के आंदोलन देश भर में चल रहे थे इसी दौर में गल्ला आंदोलन हुआ जिसमें इनके देशप्रेम के जज्बे ने इनको आंदोलन में शामिल होने के लिये प्रेरित कर दिया मय इनके अनेक विद्यार्थी भी उसी आंदोलन में शामिल हो कर खूब लूटपाट मचाई और प्रशासन को झुकने पर मजबूर कर दिया भले इन सबको आंदोलन का अपराधी मानकर जेल में डाल दिया गयाऔर यातनाएं भी मिलीं मगर इसकी परवाह न करते हुए देश प्रेम के जज्बे को कम न किया बल्कि दुगने साहस से और आगे बढे ऐसे अनेक किस्से है जिनमें वे शामिल हुए उन्होंने देशप्रेम के सामने परिवार की जिम्मेदारी को गौड़ माना मगर प्रथम स्थान पर देश को रखा।देशभक्ति के साथ निडरता और ईमानदारी भी उनका सबसे बड़ा गुण था साथ ही सदा सच्चाई के मार्ग को चुना इसलिये बड़े बड़े अधिकारी भी बात करने से कतराते रहे।
देश की आजादी के बाद एक शिक्षक की नोकरी मिली फिर भी अपनी पढ़ाई को जारी रखा और भाई बहनों की पढ़ाई भी जारी रखी अपनी शिक्षा को सतत आगे बढ़ाते रहे और कानपुर के डी ए बी कालेज से बी ए की उपाधि हासिल की इसके बाद एम ए हिंदी से किया काशी हिंदू विश्वविद्यालय बनारस से फिर कुछ दिन बाद भाषा विज्ञान से डबल एम ए किया डॉक्टर हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से बी एड की डिग्री छतरपुर पी जी वी टी कॉलेज से की।
अपने अध्यापन काल में अनेक लेख लिखे जो देश की भिन्न भिन्न पत्रिकाओं और अखबार में समय समय पर प्रकाशित होते रहे इसके साथ ही कुछ लोगों के अभिनन्दन ग्रंथ में उनकी सम्पादकीय में छपे और देश के बहुत उत्कृष्ट साहित्यकारों की किताबों की समीक्षा भी समय समय पर करते रहे इसके बाद इनका किताब के रूप में प्रथम संस्करण आया वो था हिंदी की सरल भाषा में व्याकरणए वो छोटे बच्चों को ध्यान में रखकर लिखी गई थी जिसमें व्याकरण सीखने के बहुत से सरल तरीके बताए गए थे मगर आज दुर्भाग्य है कि उसकी कोई प्रति मौजूद नहीं यहाँ तक की प्रकाशक के पास भी उपलब्ध नहीं हो रही।
इसके बाद लगभग 1970 से भाषा के विद्यार्थी होने के नाते जिस बोली में जन्में पले और बड़े हुए उसके प्रति कुछ ऐसा करने का बीड़ा उठाया जिसमें वो सदा यादगार भी रहे साथ ही सदियों तक मार्गदर्शक का भी काम करे इसके अंतर्गत सबसे पहले बुंदेलखंड क्षेत्र के एक सौ मील की परिधि में बोली जाने वाली बुंदेली के शब्दों का संकलन का काम शुरू किया जो एक बहुत बड़ा कोष बनकर तैयार हुआ फिर उसी विषय बुंदेली की शब्द सम्पदा स्त्रोत एवं सामर्थ्यः विषय पर सागरविश्वविद्यालय से डॉक्टर पी के जैन जी के निर्देशन में पी एच डी की हालांकि इस सब के बीच एक उन्हें गहरा आघात भी लगा उनके पुत्रवत छोटे भाई जो कैंसर जैसी घातक बीमारी की वजह से 2 जुलाई 1976 को काल कलवित हो गए ये उनके जीवन का सबसे बड़ा आघात था इस आघात ने उनके पी एच डी के काम को जैसेव बिल्कुल रोक दिया फिर लगभग 4 वर्ष बाद इनके अनेक मित्रों ने गम से उभारने में मदद की बल्कि पी एच डी के काम को पुनः 1980 में शुरू कराया जब जाकर 2002 में वो सम्पूर्णता को प्राप्त हुई और उन्हें एक समारोह में डॉक्टरेट की उपाधि से विभूषित किया गया जो उन्होंने अपने स्वर्गीय छोटे भाई को समर्पित की।
पूज्य पिताजी के हिंदी साहित्य और भाषा विज्ञान की तो महारत थी ही साथ में राजनीति एवं इतिहास पर भी अच्छी पकड़ थी उसी पकड़ और महारत के परिणाम स्वरूप उन्होंने एक किताब लिखीःहिन्दू मुस्लिम एकताःइतिहास के संदर्भ मेंःजिसे सभी लोगों के द्वारा बहुत ही ज्यादा सराहा गया हालांकि जहाँ कहीं इतिहास को समझने में दिक्कत हुई वहाँ उनके परम मित्र इतिहासकार सेवा निवृत प्राचार्य श्री त्रिलोक चन्द्र जी शर्मा एवं सेवा निवृत्त प्रधान अध्यापक श्री हरि विष्णु जी अवस्थी ने उनका बराबर सहयोग किया जिसे पूरे देश में भी सराहना मिली इसके बाद एक अंतिम कृति के रूप में लोकोक्तियाँ एवं मुहावरे की किताब छपी जो बुंदेलखंड में मील का पत्थर साबित हुई इसमें वे सब लोकोक्तियाँ और मुहावरों को लिया गया जो प्रचलित तो हैं ही साथ ही उनका भी समावेश है जो समय और पुराने आदमियों के समाप्त होने पर विलुप्त होने की कगार पर थे इसलिये ये कृति अपने आप में महत्त्वपूर्ण है।
बुंदेली शब्दकोश और हिन्दू मुस्लिम एकता दोनों संकलनों पर प्रदेश सहित देश के अनेक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया खासकर देश की हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा उन्हें गोहाटी में एक बहुत बड़े समारोह में बुलाकर सम्मानित किया गया जिसमें नकद राशि शॉल श्रीफल के अलावा स्थायी धरोहर भी प्राप्त हुई थी जो वास्तव में उनके लिये तो गौरव की बात थी ही सम्पूर्ण बुंदेलखंड के लिये गौरव थी।
सम्मानों की चर्चा में अभी मरणोपरांत भी श्री गंगा प्रसाद बख्सी जी के नाम से धरोहर सम्मान अभी पिछले माह दिसम्बर में ही प्राप्त हुआ जिसे मैंने स्वयं ग्रहण किया।
उनको मिले पूरे सम्मानों की चर्चा करने बैठेंगे तो फिर लेख भी बहुत बड़ा हो जाएगा इसलिये सम्मानों की चर्चा को यहीं विराम देता हूँ बल्कि अंत में एक बात कहना चाहता हूं कि उनकी अमर कृति बुंदेली शब्द कोष से न केवल देश में बुंदेली पर काम करने वालों को लाभ मिल रहा है बल्कि विदेशों में भी जो कुछ विरले लोग बुंदेली बोली से प्रभावित होकर काम कर रहे हैं उनके लिये शब्दकोश देवतुल्य साबित हो रहा है।
मुझे गर्व है कि मैं उनकी संतान हूँ।उनके श्री चरणों में एक बार पुनः श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ और सदा उनके आशीष की कामना करता हूँ।
हमारा प्रयास है कि उन जैसा तो सपने में नहीं बन सकता मगर फिर भी उनकी इस विधा को जहाँ तक हो सकेगा सम्हालूँगा भी और आगे बढ़ाने का भी प्रयास करूंगा साथ ही बुंदेली बोली के विकास में जो भी अधिकतम सहयोग होगा वो करके उनके काम को पूरी ईमानदारी और मेहनत से आगे बढ़ाऊंगा।
-दुष्यन्त कैलाश द्विवेदी
टीकमगढ़ मध्यप्रदेश
9131132846
उत्तम गुरु और उत्तम शिष्य
-कलश सत्यार्थी
कभी शब्द शिल्प से और कभी रंग रेखाओं के मिस से बुन्देली के उस अरूप आनन्द को सरूप देने में गुणी भाई गुणसागर सत्यार्थीद्ध का जवाब नहीं है । ये पंक्ति आचार्य दुर्गाचरण शुक्ल ने अपने लेख में लिखी हैं तो प्रो कान्तिकुमार जैन ने बहुचर्चित पत्रिका ष्ईसुरीष् के एक अंक में लिखा है दृ श् भाई गुणसागर जी शब्द शिल्पीए रेखांकन मेंसिद्धहस्त और लोक संस्कृति के मर्मज्ञ हैंश् । उनकी इन विशेषताओं के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता वह सब उनके कृतित्व में यदि रहे हैं तो उनके अध्ययेता जानें मै तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि वो मेरे पूज्य पिताजी हैं और मैं उनका आत्मजए इसी नाते मैं उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ कही.अनकहीए सुनी.अनसुनी बातों का ही उल्लेख उनके ही शब्दों में कर सकता हूँ ।
अतः समय.समय पर उनसे पूछे गये प्रश्नों के उत्तर मेरे पास हैं जिसमें मैने उनकी यादों को ताजा किया है जिससे उनके अन्दर की बातए उनकी भावनाएँ और
उनकी सोच समझ में आई। पूज्य पिताजी साहित्यकार के रूप में विख्यात हैं । उन्होंने कई विधाओं में सृजन किया है । मुख्यतः बुन्देलीए खड़ी बोली और राजस्थानी में काव्यए बुन्देली में गीत नाट्यए नाटकए शोध निबन्धए ललित निबन्धए रेडियो वार्ताए रेडियो रूपकए संगीत रूपकए वृतचित्र हेतु आलेख लेखनए गीत काव्य रेडियो एवं फिल्मों हेतु गेयए कहानीए उपन्यास एवं लोक साहित्यए अनुवाद एवं भाषान्तरण कार्य आदि । वहीं चित्रकला द्वारा लोकचित्रण किया है । हर विधा में लिखकर साहित्य जगत की सेवा की है । बहुत कुछ साहित्य लिखा है जिसमें से कुछ प्रकाशित हुआ है तो कुछ अप्रकाशित है ।
इन्हें कई मान सम्मान व अलंकरण प्राप्त हुए हैं । दो शोधार्थियों ने अवदान को लेकर अलग.अलग शोध प्रबन्ध लिखकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है । यह हम सभी जानते हैं हिन्दी जगत में उनका नाम है कि पीढ़ी दर पीढ़ी वंशगत महती परम्परा उनकी काव्य प्रेरणा घर में साहित्य और संगीत का वातावरणए महात्मा गाँधी जी से प्रभावित परिवार उनकी पृष्ठभूमि रही है । साथ ही उन्हें लोक साहित्य ए लोक कलाए लोक संस्कृतिए लोक संगीतए शास्त्रीय संगीत से प्रेमए अतः उनकी इन अभिरुचियों को देखते हुए मैंने समय समय पर उनसे चर्चाए की तो वे उत्तर मेरे पास हैं और मैने पाया कि उनमें एक बहुत अच्छे गुरु और बहुत ही अच्छे शिष्य के सारे गुण मौजूद हैं । उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में बहुत से लोगों से अलग.अलग विधाओं के बारे में सीखा है और उनमें से कुछ को अपना गुरुतुल्य माना है । तो बहुत से लोगों को उन्होंने खुद तराशा है और वे उन्हें अपना गुरु मानते हैं ।
पूज्य पिताजी के सृजन और सृजन धर्मिता से पूर्व उनकी अभिरुचि की बात करते हैं जिसमें उनकी प्रथम अभिरुचि थी चित्रकारी करनाए क्योंकि वे स्वयं को पहले चित्रकार ही मानते थे । वे बताया करते थे दृ श्जब मैं छोटा था तब एक चलते.फिरते सर्वाेदयी साधु पदयात्रा करते हुए चिरगाँव आए थे वे वर्षाकाल में जहाँ पहुँच जाते वहीं चातुर्मास बिताया करते थे उस वर्ष उनका चातुर्मास चिरगाँव में ही बीता था । वे वहाँ चार महीने रहकर बच्चों की बालवाड़ी चला रहे थे । मैं भी उनकी बालवाड़ी जाता था । वे कागज पर सुन्दर.सुन्दर रेखाचित्र बनातेए जिन्हें देखकर बच्चे खुश होते थे मैं बड़ा बच्चा थाए मेरे मन में उत्सुकता जागी कि क्या मै ऐसे चित्र नहीं बना सकता घ् बस वहीं से मेरे मन में चित्रकार बनने का अंकुर फूट पड़ा ।
समय बीतता गया और संयोग ऐसा हुआ मुझे ज्ञात हुआ कि चित्रशाला मसूरी देहरादून की चित्रशाला के विख्यात चित्रकार श्री कालीचरण जी झाँसी में ह
तो मैं चिरगाँव से झाँसी तक पूरे 30 किलोमीटर पैदल चलकर गया था । और उनकी चित्रशाला में पहुँचकर उनके चरण पकड़कर बैठ गया कि मुझे चित्रकारी सिखाइये गुरुदेव ।उन्होंने मुझे गुरु मंत्र दिया कि ष्चित्र बनाने के पूर्व फलक के शीर्ष पर सर्वप्रथम श्रीराम लिखोए फिर अपनी माँ का आँख बन्द करके ध्यान करोए उसके बाद ध्यान पूर्वक चित्रांकन करो ।ष् इस गुरुमंत्र के बाद उन्होंने एक माचिस की डिब्बी मेरे सामने रखी और कहा दृ ष्इसे गौर से देखते रहनाष् वे कमरे से बाहर चले गएए थोड़ी देर में पुनः वापस आए तो मैने उनकी ओर देखाए तो वे पुनः वापस चले गए । इसी प्रकार वे बार.बार कमरे में आए और बार.बार मैने उनकी ओर देखा। अन्त में एक बार वे कब आकर मेरे पास बैठ गए मुझे पता ही न चला क्योंकि मेरी दृष्टि तो माचिस पर टिकी हुई था। उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रखकर कहा शाबास । जब कोई चित्र बनाओ तो तुम्हारी निगाह कलम पर इसी तरह एकाग्र होनी चाहिए कि कोई ढोल भी बजाए तो तुम्हें सुनाई न देष् । यही गुरुमंत्र वापस चिरगाँव लौटकर आने के बाद मुझे याद रहा और मैं चित्रकारी करने लगा, तो गुरुदेव कालीचरण से गुरुमंत्र लेकर चित्रकारी सीखी और अभ्यास करते.करते एक सफल चित्रकार हुए और अपने जीवन की शुरुआत से ही एकाग्रता का पाठ पढ़ा और बता दिया कि यदिहम ठान लें तो कुछ भी असम्भव नहीं है ।
पूज्य कालीचरन जी को चित्रकारी का अपना गुरु मानते थे और उनके प्रति कृतज्ञ होते थे और उनके उपकार को भी नहीं भूलते थे यही उनके सफल जीवन का मंत्र रहा है । उनकी अभिरुचि में शास्त्रीय संगीतए लोक संगीतए लोकधर्मी गतिविधियाँ रही हैं तो मैने बचपन से उन्हें हमेशा शास्त्रीय संगीत या लोक संगीत सुनते ही देखा है । फिल्मी संगीत उनको कभी भी प्रभावित नहीं कर सका । शास्त्रीय संगीत का कोई भी कार्यक्रम यदि कहीं होता तो उन्हें ससम्मान बुलाया जाता रहा । शास्त्रीय संगीत या सुगम संगीतए लोक संगीत का कोई भी प्रतिस्पर्धा रूपी कोई भी कार्यक्रम यदि कहीं भी क्षेत्र में होता तो निर्णायक के तौर पर उन्हें बुलाया जाता रहा । अतः एक साहित्यकारए चित्रकार के साथ.साथ शास्त्रीय संगीत के जानकार के रूप में उनका नाम रहा है।
यहाँ तक कि संगीतकार गुंदेचा बन्धु ने अपने एक अभिमत में लिखा है दृ श् पंण् गुणसागर सत्यार्थी पर्फार्मिंग कलाकार न होते हुए भी संगीत के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान अवश्य रखते हैं । भारतीय संगीत का क्षेत्र स्वयं में बहुत विशाल है । पर्फार्मिंग कलाकार किसी एक पक्ष में दक्षता प्राप्त कर महफिलों में वाहवाही लूटते हैं परन्तु सत्यार्थी जी भारतीय संगीत की आत्मा से साक्षात्कार करत
उनकी सोच समझ में आई। पूज्य पिताजी साहित्यकार के रूप में विख्यात हैं । उन्होंने कई विधाओं में सृजन किया है । मुख्यतः बुन्देलीए खड़ी बोली और राजस्थानी में काव्यए बुन्देली में गीत नाट्यए नाटकए शोध निबन्धए ललित निबन्धए रेडियो वार्ताए रेडियो रूपकए संगीत रूपकए वृतचित्र हेतु आलेख लेखनए गीत काव्य रेडियो एवं फिल्मों हेतु गेयए कहानीए उपन्यास एवं लोक साहित्यए अनुवाद एवं भाषान्तरण कार्य आदि । वहीं चित्रकला द्वारा लोकचित्रण किया है । हर विधा में लिखकर साहित्य जगत की सेवा की है । बहुत कुछ साहित्य लिखा है जिसमें से कुछ प्रकाशित हुआ है तो कुछ अप्रकाशित है ।
इन्हें कई मान सम्मान व अलंकरण प्राप्त हुए हैं । दो शोधार्थियों ने अवदान को लेकर अलग.अलग शोध प्रबन्ध लिखकर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है । यह हम सभी जानते हैं हिन्दी जगत में उनका नाम है कि पीढ़ी दर पीढ़ी वंशगत महती परम्परा उनकी काव्य प्रेरणा घर में साहित्य और संगीत का वातावरणए महात्मा गाँधी जी से प्रभावित परिवार उनकी पृष्ठभूमि रही है । साथ ही उन्हें लोक साहित्य ए लोक कलाए लोक संस्कृतिए लोक संगीतए शास्त्रीय संगीत से प्रेमए अतः उनकी इन अभिरुचियों को देखते हुए मैंने समय समय पर उनसे चर्चाए की तो वे उत्तर मेरे पास हैं और मैने पाया कि उनमें एक बहुत अच्छे गुरु और बहुत ही अच्छे शिष्य के सारे गुण मौजूद हैं । उन्होंने अपने पूरे जीवनकाल में बहुत से लोगों से अलग.अलग विधाओं के बारे में सीखा है और उनमें से कुछ को अपना गुरुतुल्य माना है । तो बहुत से लोगों को उन्होंने खुद तराशा है और वे उन्हें अपना गुरु मानते हैं ।
पूज्य पिताजी के सृजन और सृजन धर्मिता से पूर्व उनकी अभिरुचि की बात करते हैं जिसमें उनकी प्रथम अभिरुचि थी चित्रकारी करनाए क्योंकि वे स्वयं को पहले चित्रकार ही मानते थे । वे बताया करते थे दृ श्जब मैं छोटा था तब एक चलते.फिरते सर्वाेदयी साधु पदयात्रा करते हुए चिरगाँव आए थे वे वर्षाकाल में जहाँ पहुँच जाते वहीं चातुर्मास बिताया करते थे उस वर्ष उनका चातुर्मास चिरगाँव में ही बीता था । वे वहाँ चार महीने रहकर बच्चों की बालवाड़ी चला रहे थे । मैं भी उनकी बालवाड़ी जाता था । वे कागज पर सुन्दर.सुन्दर रेखाचित्र बनातेए जिन्हें देखकर बच्चे खुश होते थे मैं बड़ा बच्चा थाए मेरे मन में उत्सुकता जागी कि क्या मै ऐसे चित्र नहीं बना सकता घ् बस वहीं से मेरे मन में चित्रकार बनने का अंकुर फूट पड़ा ।
समय बीतता गया और संयोग ऐसा हुआ मुझे ज्ञात हुआ कि चित्रशाला मसूरी देहरादून की चित्रशाला के विख्यात चित्रकार श्री कालीचरण जी झाँसी में ह
ेहुए उसके भीतर इतने रचे.पचे हैं कि न केवल राष्ट्रीय स्तर का कोई बड़ा कलाकार अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति अर्जित करने वाला कलाकार को सुनकर वे उसकी बारीकियों से जब अवगत करा देते हैं तो स्वयं कलाकार चौंक पड़ते हैं ।
तब मैं उनसे पूछा करता था कि आपकी अभिरुचियों में शास्त्रीय संगीत है तो क्यों है घ् जबकि न तो आप गाते बजाते हैं और न ही शास्त्रीय संगीत आपने सीखा है घ् यह गूढ़ संगीत आपकी समझ में कैसे आ जाता है घ् इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि दृ श्हाँ न मैं स्वयं गाता दृ बजाता हूँ और न ही कहीं सीखने गया । मेरे मित्र उर्मिल जी ने भी एक दिन एसा ही प्रश्न साश्चर्य मुझसे पूछा था कि तुम यह कैसे जान जाते हो कि यह फलाना राग गाया या बजाया जा रहा है घ् तो मैने उनसे कहा तुमने कबीर का दोहा नहीं पढ़ा कि दृ ष्कबीर संगत साधु कीए ज्यों गंधी का वासए जो कुछ गंधी दे नहीं तो भी वास सुवास ।
इस तरह से उन्होंने कहा कि ष्मेरे पूज्य पिता स्वण् पंण् गुलाबराय के बारे में राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त ने कहा था कि दृ ष् गुलाबराय की गिनती हिन्दुस्तान के इने गिने बड़े संगीतज्ञों में की जा सकती हैष् ।तो मेरे पिताजी से संगीत सीखने उनके कई शिष्य घर आया करते थे अर्थात् घर में ही संगीत का वातावरण था । मै देखता कि देर रात तक उनकी शिष्य मंडली बाहर वाली पौर ;बैठकद्ध में गाते दृ बजाते पिताजी उन्हें संगीत की बारीकियाँ जोर जोर से बोलकर और गाकर भी समझाते थे । वह सब न चाहते हुए भी मेरे कानों में प्रवेश करता था । उसके बाद जब मैं लखनऊ जाता तब पूज्य काका ; स्वण् जंगबहादुर शर्मा द्ध जो आकाशवाणी लखनऊ में एक वरिष्ठ संगीत रचनाकार थेए उनके यहाँ भी वही माहौल था वहाँ उनकी शिष्य मंडली का भी तान तंबूरा मुझे वैसा ही हैरान करता था ।
जब मेरी 1958 में मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरी लगी तो पहली नियुक्ति नौगाँव ;छतरपुरद्ध में हुई जहाँ मेरे अग्रज ;श्री ज्ञानसागर शर्मा द्ध संगीत शिक्षक थे अतः वहाँ भी वही वातावरण । तो कहा भी गया है कि दृ करत.करत अभ्यास के जड़मति होत सुजानए रसरी आवत जात से सिल पर परत निसान ।ष् मै भी पत्थर के समान कठोर और संगीत के मामले में पूरी तरह से जड़मति ही था । लेकिन मेरे उस जीवनकाल में संगीत के वातावरण रूपी रस्सी सतत सरकती रही तो मेरे जैसे पत्थर सम कठोर हृदय में निशान अनचाहे में ऐसे पड़े कि अब वह मुझे अच्छा लगने लगा है ।श् यहाँ यह बताना आवश्यक है कि चित्रकारी से साहित्य की और उन्मुख हुए तो अपना उपनाम ष्सत्यार्थीष् रख लिया जैसे कि ष्बच्चनष्ए ष्निरालाष्ए ष्सुमनष्ए ष्प्रसादष् तो प्रश्न उठता है कि सत्यार्थी ही क्यों घ् तभी याद आता है कि स्वामी सत्यभक्त जी से प्रभावित रहे उनको अपना गुरु माना और सर्व धर्म समानत्व को मानते हुए सत्य और अहिंसा को अपनाया । यह सब जानते हुए मैने पूछ ही लिया कि . आपके जीवन के आदर्श कौन रहे घ् और सार्व देशिक सत्यसमाज के संस्थापक दृ स्वामी सत्यभक्त जी का प्रभाव आपके जीवन में कैसे और कितना पड़ा घ् तो उन्होंने बताया कि मेरे उस बाल्यकाल में जब केवल आवारा लड़कों की ही संगत थी ।
परन्तु उन आवारा लड़कों में भी पानी में पुरेंन ;कमलद्ध की ही भाँति यदि रहा तो उसके पीछे एक ही कारण है कि मै अपने बाल्यकाल से ही दो महापुरुषों से प्रभावित रहा दृ पहले महात्मा गाँधी जिनका प्रभाव पारवारिक पृष्ठभूमि से पड़ा और दूसरे स्वामी दयानन्द सरस्वती जिनका प्रभाव पाठशाला में आर्यसमाजी सन्त स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती का प्रवचन सुनकर पड़ा और मैं आर्यसमाजी गतिविधियों से जुड़ा । आगे चलकर जब मेरा विवाह हो चुका तो तुम्हारी माँ के मुँह बोले भाई कविवर राधेश्याम योगी नेए जो उस समय गाजियाबाद थे और ष्सत्यसमाजष् नाम के साप्ताहिक पत्र के संपादक थेए उन्होंने अपना साप्ताहिक पत्र मेरे पास भेजना शुरू किया तो उसे पढ़कर मैं पूज्य स्वामी सत्यभक्त से प्रभावित हुआ । तब न तो मेरे आदर्श महात्मा गाँधी ही जीवित थे और ना ही स्वामी दयानन्द सरस्वती । मैं पूज्य स्वामी सत्यभक्त जी को अपना तीसरा आदर्श मान चुका था मैंने उनके दर्शन किये उनसे दीक्षा लेकर उन्हें अपने दीक्षा गुरु के स्थान पर स्थापित किया ।
पूज्य पिताजी की बहुरंगी मित्र मंडली में हर तरह के मित्र हैं कुछ अपनेए कुछ बहुत अपने सभी से दिल से रिश्ता रहा है इन्हीं में से कई लोग ऐसे भी हैं जिनसे उन्हें प्रेरणा मिलती रही है । हर तरह की सृजन धर्मिता में अलग.अलग प्रेरक भी रहे हैं । जरूरी नहीं कि उनसे मिले हों यदि उनके बारे में पढ़ा होए सुना हो या कभी उनके विचार सामने आए हो और कोई प्रेरणा मिली हो तो प्रेरक तो हो ही जाते हैं । तो इसी संदर्भ में मैने उनसे पूछा कि दृ आपकी सृजन धर्मिता को किस.किस ने प्रेरित किया घ् तब उन्होंने बताया कि दृ श्प्रेरक महापुरुष ही नहीं होतेए छोटे बच्चों से भी मुझे प्रेरणा मिली है और ऐसे लोगो से भी जिनसे मैं कभी नही मिला । जैसे स्वण् देवेन्द्र सत्यार्थी से मैं कभी नहीं मिला । वे लोक पुरुष थेए कंधे पर थैला लटकाए भारत के असंख्य गाँवों की पैदल चलकर खाक छानी और लोक साहित्य का उन्होंने संकलन किया । लोक साहित्य ँएवं लोक संस्कृति का अध्ययनकरने का उनका तरीका मुझे पसन्द है । पाश्चात्य साहित्य की मात्र पुस्तकें पढ़कर ष्लोकष् से यथार्थ साक्षात्कार संभव नहीं है । वह तो लोक में स्वयं गहरे धँस कर ही सम्भव है । ऐसा करने वाले श्री राम नरेश त्रिपाठी से भी आगे बढ़कर श्री देवेन्द्र सत्यार्थी इकलौते व्यक्तित्व थे जिनसे प्रेरणा मुझे मिली और मैंने गाँवों की पदयात्राएकी व बुन्देलखण्ड की विस्मृत लोक परम्परा ष्पण्डवाष् की खोज कर सका । भाई लोकेन्द्र सिंह नागर ने भी मेरी परामर्श पर इस मार्ग को वरण किया और ईसुरी को गहरे पैठ कर खोज कर ईसुरी पर शोधपूर्ण कार्य किया जो वृहत् ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित हुआ ।
इसके अतिरिक्त भारतीय लोक कला मंडल उदयपुर राजस्थान के संस्थापक पद्मश्री से विभूषित श्री देवीलाल सामर जी से भी मैं मिलाए उदयपुर में उनका लोककला मंडल भी देखाए लोकधर्मी गतिविधियों के लिए मैं उन्हें प्रेरणा का श्रोत मानता हूँ । देवेन्द्र सत्यार्थी और देवीलाल सामर के अतिरिक्त और भी कई लोगों ने मुझे प्रेरित किया है जिनमें अशोक वाजपेईए श्याम सुन्दर बादलए कैलाश अवस्थीए पंण् श्यामनारायण कश्मीरीए भवानी प्रसाद मिश्रए डॉण् रामकुमार वर्माए विन्ध्य कोकिल भैयालाल व्यासए पंण् बनारसीदास चतुर्वेदीए वियोगी हरिए सियाराम शरण गुप्तए मैथिली शरण गुप्तए वृन्दावन लाल वर्माए श्री राम शर्माए डॉण् महेन्द्र वर्माए डॉण् केण्केण् चक्रवर्तीए श्री नारायण चतुर्वेदीए राम प्रसाद शर्मा उपरीनए मोती बीण्एण्ए पंण् परमानन्दए पीण्एनण् रूसिया जैसे कितने लोग हैं जिनसे मैं सदैव मिलता रहा और प्रेरणा प्राप्त करता रहा ।
सभी श्रद्धेय और आदरणीय इनमें से मैं किन.किन के बारे में बताऊँ जैसे सियाराम शरण गुप्त ने मुझे कार्टून चित्रण के लिए प्रेरित किया था कि कार्टून विधा भी बहुत शक्तिशाली विधा है । पत्र लेखन की विधा के लिए पंण् बनारसीदास चतुर्वेदी ने प्रेरित किया है । बाबू वृन्दावनलाल वर्मा की उपन्यास लिखने की शैली को पसन्द करता हूँ तो उनसे प्रेरित होकर उपन्यास भी लिखा है ।
मोती बीण्एण् से प्रेरित होकर रेडियो रूपक लिखना शुरू किया । वे आकाशवाणी लखनऊ में रेडियो रूपक ;व्च्म्त्।द्ध लिखा करते थे । तब मैने भी उनकी ही बताई हुई तकनीकि से हरदौल ऑपेरा सबसे पहले लिखा जो आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित हुआ । उसके बाद तो बहुत रूपकए संगीत रूपक लिखे और मुझे लगता है रूपक की विधा मेरे बाद शायद समाप्त भी हो जाए । आचार्य दुर्गाचरण शुक्ल और ललितपुर के कृष्णानन्द हुण्डैत ये दा यक्तित्व मेरी मित्र मण्डली में गुरुवत तुल्य हैं । हुण्डैत जी से छन्द प्रणयन की दीक्षा मिली तो आचार्य शुक्ल जी से कविता की गहराई तक जाने का मार्ग । और मैं इन दोनों के प्रति कृतज्ञ हूँ ।
डॉण् कैलाश बिहारी द्विवेदी भाषा शास्त्री हैं उनकी दृष्टि भाषायी कौशल पर केन्द्रित रहती हैए भाषा की शुचिता उन्हें पसन्द है मैं उनके इस गुण से प्रभावित हूँ अपने लेखन में उनको भी प्रकाश स्तम्भ के रूप में स्वीकार किया है । कहानीए उपन्यासए नाट्य लेखन में श्री बीण्केण् त्रिपाठी ;कक्का सरद्ध का दिशा निर्देशन मैने अधिक महत्वपूर्ण माना है । वे संवेदनशील हैं और पाठकों की नब्ज को एक कुशल वैद्य या हकीम की तरह जानते हैं । तो कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कहीं न कहीं मेरे लिए प्रेरणा के श्रोत रहे हैं जैसे प्रोण् कान्तिकुमार जैनए भास्कराचार्य त्रिपाठीए राधावल्लभ त्रिपाठी आदि । ठाण् लोकेन्द्र सिंह नागर तो उल्टा मुझे ही अपने लिए प्रेरणा का श्रोत मानते हैं जबकि वे छात्र जीवन के मेरे मित्र हैं । मेरा मित्र संसार एक उद्यान की भाँति विशाल है जिसमें रंग.रंग के पुष्प हैं सभी की महक मेरे जीवन में समाई हुई है चाहे वे जबलपुर के राजकुमार तिवारी ष्सुमित्रष् हों या नीमच के बालकवि बैरागीए श्री एसण्एनण् दुवेए राधेश्याम योगीए हरीश्याम पारथ आदि अनेक मित्र हैं । किस किस के नाम गिनाऊँ सूची लम्बी है ।श्
तब मैने उनसे पूछा कि आपकी सृजन के क्षेत्र में अनेक विधाएँ हैं । आप को सबसे अधिक प्रिय कौन सी विधा लगती है । तब उन्होंने कहा दृ श्यह मत पूछोए सृजन की सभी विधाएँ मुझे प्रिय हैं । परन्तु सबसे अधिक प्रिय तो मुझे यह लगता रहा है कि . स्वयं को पीछे करके दूसरों को आगे बढ़ाया करूँ । मैं स्वयं अपना सृजन करने के बजाय दूसरों के सृजन से खुश होता हूँ अतः जब भी कोई जिज्ञासु रचनाधर्मी सीखने की गरज से या प्रेरणा प्राप्त करने मेरे पास आते हैं तो मैं अपना जरूरी से जरूरी काम छोड़कर उन्हें पर्याप्त समय देकर सन्तोष का अनुभव करता हूँ बुन्देली कविता के क्षेत्र में श्री लोकेन्द्र सिंह नागर आज बहुत आगे बढ़ गए हैंए उनका यह गौरव देखकर मुझे बहुत ही प्रसन्नता होती है ।
चिण्सुधाकर हो या रतिभानु तिवारी कंज या डॉण् सुरेश प्रियदर्शी अथवा डॉण् सुरेश पराग या सुश्री सुधारावत ष्क्षमाष् इनके लिए पर्याप्त समय मैने सदैव दिया है । आज भी चिण् रज्जू ; ओम प्रकाश तिवारी द्ध को पर्याप्त समय देता हूँ । वे बहुत अच्छा लिखने लगे हैं । दूसरे लोग लिखें और आगे बढ़ें इसमें मुझे अपने स्वयं के सृजन से अधिक सुख मिलता है । इसके अतिरिक्त मैने स्वयं के सृजन काछोड़कर संगीत के क्षेत्र में टीकमगढ़ की एक गायिका दृ श्रीमती असगरी बाई को भी प्रकाश में लाने का कार्य किया है । और वे इतनी आगे बढ़ी कि तानसेन सम्मानए शिखर सम्मान पाने के बाद पद्म श्री से भी अलंकृत हो गईं ।
पूज्य पिताजी ने इसमें जाहिर किया कि उन्हें अपने सृजन से अच्छा दूसरों को आगे बढ़ाने मेए उनकी मदद करने में और उनके बढ़ते हुए सृजन से ज्यादा खुशी मिलती है । और इस बात में सौ प्रतिशत सच्चाई है । मैने हमेशा उन्हें ऐसे ही कार्यों में ज्यादा व्यस्त देखा है । पिताजी के पास जो भी आया कभी खाली हाथ नहीं गया । बुन्देली लोक कलाए लोक संस्कृतिए लोक साहित्यए लोक संगीतए कविताए गीतए रूपकए संगीत रूपकए कहानी नाटक आदि हर विधा को किसी न किसी को हमेशा बताते ही रहे हैं ।
बहुत सी घटनाएँ है किन.किन का जिक्र करूँ । जैसे भोपाल से नवीन सागर बंशी कौल किन्ही विदेशी शोधार्थियों को लेकर आते हैं जो कि बुन्देली लोक नृत्यों पर शोध करना चाहते थे । उन्हें पिताजी गाँव.गाँव लेकर गए उन्हें नृत्य दिखवाए जिन्हें उन्होंने अपने कैमरे से शूट कियाए रिकार्डिंग की । और बुन्देली लोक संगीत के बारे में विस्तार से बताते रहे । तो कुछ इसी तरह के कार्यों से वे ज्यादा सन्तुष्ट रहते थे । वे हमेशा कहा करते थे कि दृ श्मेरे लिए साहित्य सृजन साहित्य साधना हैए साहित्य सेवा हैए जो मैं कर रहा हूँ और जीवनभर करता रहूँगा ।श्
-कलश सत्यार्थी
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श्रद्धांजली लेख-
बुन्देली काव्य के पुरोधाः डॉ. दुर्गाप्रसाद दीक्षित ‘‘दुर्गेश’’
डॉ. दुर्गाप्रसाद दीक्षित ‘‘दुर्गेश’’ यह नाम कुछ अपरिचित-सा लगता है। लगे भी क्यों न ? अपने उपनाम से ही लोकप्रिय डॉ. ‘‘दुर्गेश’’ दीक्षित के पूरे नाम से बहुत कम और करीबी लोग ही परिचित थे। ‘डॉ. दुर्गेश दीक्षित’ ही उनका परिचय था। साहित्य जगत ही नही सामान्य जन भी उन्हें ‘डॉ. दुर्गेश दीक्षित’ के नाम जानते-पहचानते थे। डॉ. ‘‘दुर्गेश’’ का जन्म आशुतोष शिव कें पावन धाम कुण्डेश्वर के प्रतिष्ठित दीक्षित परिवार में बारह जून सन् उन्नीस सौ उनतालीस में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. महादेव प्रसाद दीक्षित और माता का नाम श्रीमती रामकुँवरि था।
उनकी शिक्षा कुण्डेश्वर और टीकमगढ़ नगर में हुई थी। उस ज़माने में हिन्दी और संस्कृत से एम.ए. होना ही बड़ी बात थी उस पर पी-एच. डी और डी. लिट् होना सोने में सुहागा ही था। शिक्षा विभाग में कई पदों पर कार्य करने के बाद उन्होंने शा. उ. मा. वि. अस्तौन में प्राचार्य पद को सुशोभित किया और वहीं से सेवानिवृत्त हुए।
सन् 1958 से उन्नीस वर्ष की आयु में ही उन्होंने साहित्याराधना आरंभ की और वे शीघ्र ही कवि सम्मेलनों के मंचों पर अपनी कविताओं से धूम मचाने लगे। उनकी ठेठ बुन्देली कविताओं और प्रस्तुतीकरण के अनोखे अंदाज ने उन्हें अल्प समय में ही ख्यातिप्राप्त कवि बना दिया। मंचों के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं थीं।
आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनकी रचनाओं का नियमित प्रसारण होता रहता था। उनकी एक रचना ‘‘रेंचू-रेंचू चलै साइकिल’’ तो उनकी पहचान बन चुकी थी। उनका कोई भी कवि सम्मेलन इस कविता को सुनाए बिना पूरा नहीं होता था। वे केवल मंचीय कवि ही नहीं थे वरन् एक महान कवि और लेखक भी थे। रानी अवंतीबाई के शौर्य पर लिखा उनका खण्ड काव्य ‘बलिदान’, महा काव्य ‘बाल कृष्णायन’, बुन्देलखण्ड के स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी, सगुन की हरइँयाँ, बुन्देलखण्ड के अमर सपूत, बुन्देलखण्ड की लोकोक्तियाँ और मुहावरे, बुन्देली लोकगाथाएँ, बुन्देली के व्रतों, पर्वों,उपवासों की लोक कथाएँ, अपनों-अपनों भाग्य (बुन्देली की इक्कीस लोककथाएँ) और प्रेम कौ प्रभाव (बुन्देली कहानियाँ) उनकी साहित्य साधना का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
इसके अतिरिक्त बुन्देली में अनुदित या पद्यानुवाद निम्नांकित ग्रंथ भी उल्लेखनीय है-़ ऋतु संहार, भक्तामर, ं नेमिनाथ-राजुल (करुण-काव्य), भर्तृहरि त्रय शतक। उनके दर्जनों शोधपूर्ण आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में में निरन्तर प्रकाशित हुए हैं। डॉ. ‘‘दुर्गेश’’ दीक्षित की विभिन्न रचनाएँ बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय झाँसी, सागर, जबलपुर और ग्वालियर विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित हैं।
डॉ. ‘‘दुर्गेश’’ दीक्षित को समय-समय पर विशिष्ट सम्मानों और पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है जो इस प्रकार हैं- 1. राजा संतोषसिंह बुन्देला पुरस्कार-छतरपुर, 2. बुन्देल शिरोमणि लोक भाषा समिति-हरिद्वार, 3. बुन्देल सौरभ, नारायणदास खरे स्मृति संस्थान-टीकमगढ़,बुन्देल श्री सम्मान, बुन्देलखण्ड संस्क्ृति और साहित्य परिषद-भोपाल, 5. रवि बहादुर स्मृति सम्मान-बसारी छतरपुर, 6. श्री गंगाप्रसाद बख्शी सम्मान-टीकमगढ़, 7. जगनिक पुरस्कार (राज्यपाल महोदय द्वारा)-ओरछा, 8. भोज अलंकरण, भोज समारोह-धार, 9. हास्याचार्य अलंकरण-जीजा बुन्देलखण्डी स्मृति सम्मान-दमोह, 10. श्री यमुनाप्रसाद चनपुरिया स्मृति सम्मान-गुनौर पन्ना, 11. बुन्देल केशरी, गुरु तेगबहादुर जयंती, मथुरा, 12. पद्माकर अलंकरण- ग्वालियर, 13. कविवर कोमल कल्याण स्मृति समारोह समिति सम्मान- ग्वालियर, 14. दिव्य स्मृति सम्मान-अजयगढ़, 15. दाऊ सरदारसिंह स्मृति सम्मान-कुण्डेश्वर टीकमगढ़ 16. भवभूति अलंकरण-ग्वालियर, 17. बुन्देल गौरव अलंकरण-काठमाण्डू (नेपाल) 18. बुन्देली सपूत- लखनऊ, 19. बुन्देल-श्रेष्ठ सम्मान, पन्ना, 20. रूसिया स्मृति सम्मान- टीकमगढ़, 21. बुन्देल वैभव समारोह सम्मान- झाँसी, 22. देव पुरस्कार, बनारसीदास चतुर्वेदी समारोह- ओरछा।
सम्मानों और पुरस्कारों की यह लम्बी सूची उनके साहित्यिक अवदान की एक झलक मात्र है वस्तुतः वे इनसे अधिक और बड़े सम्मानों और पुरस्कारों के पात्र थे पर वे आत्मलीन साहित्यकार थे। उनके लिए उनका सम्मान या पुरस्कार उनका आत्मसंतोष था। वे एक सौम्य प्रवृति के कवि और लेखक थे। वे आजीवन किसी तथाकथित साहित्यिक गुट के अंग न रहकर बुन्देलखण्ड और बुन्देली के प्रति समर्पित रहे। उनके अप्रत्यक्ष मार्गदर्शन में कितनों ने ही अपनीे शोधकार्य किए हैं। वे सचमुच बुन्देलखण्ड के प्रतिनिधि कवि थे। श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद के तो डॉ. ‘‘दुर्गेश’’ दीक्षित अभिन्न अंग रहे हैं। चौरासी वर्ष की आयु में 2 फरवरी सन् 2023 को प्रातःकाल हृदयगति रुक जाने से उनका शिवलोक गमन साहित्य जगत की एक अपूरणीय क्षति है।
सम्पादक


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